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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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असीसी के विघटित तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर संत पापा का संदेश


संत पापा फ्रांसिस ने असीसी के विघटित तीर्थ के उद्घाटन के अवसर पर असीसी प्रांत के धर्माध्यक्ष दोमनिको सोरेनतीनो के नाम अपना प्रेरितिक पत्र प्रेषित करते हुए संदेश दिया।

संत पापा ने अपने पत्र में 04 अक्टूबर सन् 2013 की अपनी यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि मैं अपनी इस मुलाकात के दौरान उस टूटे हुए कमरे में खड़ा था जहाँ युवा फ्राँसिस अपने वस्त्र और सारी दुनियावी चीजों का परित्याग करते हुए अपने को प्रभु और लोगों की सेवा हेतु अर्पित किया था। इस घटना को प्रकाशित करने हेतु आप ने संत आसीसी के पुराने महागिरजा घर को पुनः स्थापित करने की पहल की है। इस क्रम ने असीसी की पवित्र भूमि को “आसमानी शहरी” का रुप दिया है जो ख्रीस्तीय तीर्थयात्रियों में आध्यात्मिक और प्रेरितिक फल उत्पन्न करता है। अतः मैं 20 मई के इसके आधिकारिक उद्घाटन हेतु आप को अपनी शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ।

संत पापा ने असीसी में अपनी प्रथम यात्रा को अपने दिल के अति करीब बताया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि संत फ्रांसिस आसीसी उस स्थान पर अपने जीवन से सारी दुनियावी धन दौलत का परित्याग किया जिसके जंजाल में उनका पूरा परिवार पड़ा था, विशेषकर, उनके पिता पीटर बेरनार्ददोने। निश्चित ही, परिवर्तित युवा फ्राँसिस ने अपने पिता के प्रति अपने सम्मान को खोया किन्तु वह अपने जीवन में इस बात को महसूस करता है कि एक बपतिस्मा प्राप्त व्यक्ति के रुप उसे, येसु को अपने प्रियजनों से अधिक प्रेम करने की जरूरत है। दीवार पर बनी चित्रकारिता में हम फ्रांसिस के खफा अभिभावकों की आँखों को देख सकते हैं जो अपने बेटे के पैसे और वस्त्र को ले जाते हैं, जबकि नंगा लेकिन सभी चीजों से मुक्त युवा अपने को धर्माध्यक्ष गुइदो की बाहों में समर्पित करता है। इस दृश्य में धर्माध्यक्ष का युवा फ्रांसिस को अपने लबादे से ढ़कना कलीसिया की मातामयी प्रेम की याद दिलाती है।

लूट का सभागार के बारे में जिक्र करते हुए संत पापा ने कहा कि यह हमें विशेष रूप से ग़रीबों से मिलने को आमंत्रित करता है। यह दृश्य हमें आज भी दुनिया में कितने ही गरीब और धनियों के बीच में उत्पन्न खाई की बात को बयाँ करता है जो जीवन की अत्यन्त जरूरी वस्तुओं से अपने को अलग पाते हैं जबकि दूसरी ओर दुनिया के चंद लोगों दुनिया की अकूत संपत्ति के मालिक बनकर रहते हैं। यह दुर्भाग्य की बात है कि सुसमाचार घोषणा के दो हजार सालों के बाद और संत फ्राँसिस के साक्ष्य के आठ दशकों के बाद भी आज हम “वैश्विक असमानता की घटना” और “अर्थव्यवस्था की हत्या”का सामना कर रहे हैं। (एवेनजेलियुस गौदियुम, 52-60) संत पापा ने अपने पत्र में लिखा कि मेरे आसीसी पहुँचने के दूसरे दिन लाम्पदूसा के समुद्री तट ने कितने ही प्रवासियों को अपने में निगल लिया। निर्वासन स्थल के बारे में जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा कि युवा फ्रांसिस जब गरीबों कोढ़ग्रस्त लोगों के बीच आयें तो उन्हें अपनी “आत्मा और शरीर के माधुर्य” की अनुभूति हुई। 

संत फ्राँसिस के नये पूजन-स्थल की अभिलाषा एक न्यायपूर्ण और संगठित समाज के द्वारा शुरू हुई जो कलीसिया को फ्राँसिस के द्वारा चुने गये पद चिन्हों का स्मरण दिलाती है जिन्होंने अपने को दुनियादारी के वस्त्रों से विमुख करते हुए सुसमाचार के मूल्यों को अंगीकृत किया। संत पापा ने निर्वासन स्थल के बारे में जोर देते हुए कहा, “हम निर्धनता का जीवन जीने हेतु बुलाये गये हैं, हम अपने जीवन का परित्याग करने हेतु बुलाये गये है,  हमें यह सीखने की आवश्यकता है कि निर्धनों के संग कैसे जीवन जीना है। एक ख्रीस्तीय गरीब को नजरंदाज नहीं कर सकता।” आज हमें कलीसिया के जीवन को वचनों के बजाय अपने कार्यों में जीते हुए नवीन सुसमाचार का साक्ष्य देने की जरूरत है। संत पापा ने अपने पत्र में कहा कि हमें मुफ्त में मिला है अतः हमें मुफ्त में देने की जरूरत है।

संत फ्राँसिस ने सुसमाचार के वचनों पर चिंतन किया, विशेषकर, उसने येसु के चेहरे को कोढ़ियों में देखा। संत दोमियानो के द्वारा उन्हें एक संदेश मिला, “फ्राँसिस जाकर मेरे घर की मरम्मत करो।”  संत फ्राँसिस के समय में गिरजाघरों की देखरेख की जरुरत थी। वास्तव में, यह पवित्र उपहारों में से एक था जो ऊपर से पापी को दिया गया था अतः उसे पापों के लिए पश्चाताप और अपने में नवीनीकरण करने की जरूर थी। यदि वह अपने को नहीं देखता तो वह अपना नवीकरण कैसे करता। जिस तरह आप अपने महागिरजाघर का पुननिर्माण करना चाहते हैं। हममें से कितने हैं जो येसु के मनोभवों को अपने में धारण करते हैं क्योंकि वे ईश्वर के प्रति रुप थे लेकिन उन्होंने दास का रुप धारण कर अपने को दीन-हीन बना लिया। वे अपनी नम्रता में क्रूस के मरण तक आज्ञाकारी बने रहे।

जन्म से ले कर पास्का तक हम येसु के रहस्य को पाते हैं। येसु का स्तत्व-हरण प्रेम का रहस्य है। यह दुनिया की वास्तविकता का तिरस्कार करने को नहीं कहती है क्योंकि दुनिया की सारी चीजें ईश्वर की ओर से आती है। संत फ्रांसिस हमें बह्माण्ड की सुन्दरता का गुणगान करने का निमंत्रण देते हैं। यह हमें ईश्वर अपने स्वार्थ का परित्याग करते हुए दुनिया की सारी चीजों में ईश्वर का महिमागान करने हेतु निमंत्रण देता है। एक सच्ची ख्रीस्तीयता हमें दुःख के मार्ग में नहीं वरन खुशी में ले चलती है।