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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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संत पापा फ्राँसिस \ मिस्सा व प्रवचन

नये कार्डिनलों को संत पापा का संदेश

- REUTERS

28/06/2018 18:07

वाटिकन सिटी, बृहस्पतिवार, 28 जून 18 (रेई)˸ संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार को संत पेत्रुस महागिरजाघर में कार्डिनल मंडल की एक विशेष सभा में 14 नये कार्डिनलों की रचना की। 

प्रवचन में संत पापा ने संत मारकुस रचित सुसमाचार के उस वाक्य पर प्रकाश डाला जहाँ कहा गया है "वे येरुसालेम के मार्ग पर आगे बढ़ रहे थे। ईसा शिष्यों के आगे-आगे चलते थे।" (मार.10:32). 

उन्होंने कहा कि संत मारकुस रचित सुसमाचार के पाठ का यह वाक्य, हमें यह समझने में मदद देता है कि प्रभु अपनी शिक्षा द्वारा किस तरह अपने चुने हुए लोगों की चिंता करते हैं। येरूसालेम की यात्रा में येसु सावधानी पूर्वक अपने शिष्यों के आगे चलते हैं। 

येरूसालेम उनके जीवन की एक स्पष्ट और निर्णायक क्षण को दर्शाता है। हम सभी जानते हैं कि जीवन में महत्वपूर्ण एवं विकट समय में, हृदय बोलता और हमारे अंतर के उद्देश्य एवं तनाव को प्रकट करता है। जीवन में ये मोड़ हमें चुनौती देते हैं, हमसे सवाल करते और उन इच्छाओं को प्रकट करते हैं जो हमेशा हमारे मानव हृदय के लिए स्पष्ट नहीं होते।

संत पापा ने कहा कि सुसमाचार पाठ में हमने जो सुना उसे यह बड़ी सरलता एवं यथार्थता के साथ प्रस्तुत करता है। येसु के दुःखभोग के तीसरे एवं सबसे दुःखद भविष्यवाणी में, सुसमाचार लेखक शिष्यों के हृदय के रहस्य को छिपाकर नहीं रखते हैं, जहाँ सम्मान पाने की चाह, ईर्ष्या, जलन, साज़िश, आराम एवं समझौता करने की लालसा है। इस प्रकार के विचार न केवल उनके संबंध को नष्ट कर देते किन्तु उन्हें बेकार के विवाद में फंसा देते हैं। फिर भी, येसु उस पर ध्यान नहीं देते, वे उनसे आगे बढ़ते हैं और चलते रहते हैं और उनके जोर देकर कहते हैं, "तुम में ऐसी बात नहीं होगी। जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने।" (मार. 10:43) इस तरह प्रभु शिष्यों के हृदय एवं नजरों को पुनः केंद्रित करते हैं ताकि समुदाय में व्यर्थ एवं आत्म निर्देशात्मक विवाद न हो।

पूरी दुनिया को पा लेने से क्या फायदा यदि हम अंदर से खराब हो जाते है? पूरे विश्व को हासिल कर लेने से क्या फायदा, यदि हम ऐसे कठिन महौल में जीते जो हमारे दिल को सूखा बना देता और हमारे मिशन में बाधा डालता है।

प्रभु कहते हैं, "किन्तु तुम्हारे बीच ऐसा नहीं होना चाहिए"। सबसे बढ़कर प्रभु अपने शिष्यों को प्रोत्साहन देते तथा चुनौती देते हैं कि वे बेहतर भाग चुने ताकि उनका हृदय खराब न हो एवं दुनियावी अंधेपन से वे न घिर जाए जो कि सचमुच महत्वपूर्ण है।

प्रभु की आवाज समुदाय को अनुचित चीजों से बचाती है और यह उनकी दृष्टि को केवल एक चीज के लिए निर्देशित करती है जो संसाधनों, आकांक्षाओं और दिल को  मिशन के लिए गिनता है।

येसु हमें शिक्षा देते हैं कि मन-परिवर्तन, हृदय में बदलाव और कलीसिया में सुधार एक मिशनरी कुँजी है जो हमें हमारी रूचि का नहीं किन्तु पिता की योजना को महत्व देने हेतु प्रेरित करती है। पाप एवं स्वार्थ से मन-फिराव अपने आप में अंत नहीं है किन्तु प्रेरिताई के प्रति निष्ठा तथा उसे स्वीकार करने की तत्परता में बढ़ना है। इस तरह हम ऐसे समय में खासकर, हमारे भाई बहनों के जीवन में कठिनाईयों के क्षण उनका साथ देने के लिए हम पूरी तरह तैयार होंगे न कि हम मिशन के लिए बाधक बनेंगे। जब हम मिशन को भूल जाते हैं हमारे भाई बहनों के वास्तविक चेहरे को याद नहीं करते, तब हमारा जीवन हमारी ही रूचियों एवं सुरक्षा में बंद हो जाता है। इस तरह उदासी एवं घृणा के साथ नराजगी बढ़ने लगती है। धीरे-धीरे हमारे पास कलीसियाई समुदाय के लिए, गरीबों के लिए, ईश्वर की आवाज़ सुनने और दूसरों के लिए जगह कम होने लगता लगती है।

येसु आगे कहते हैं, "जो तुम लोगों में बड़ा होना चाहता है, वह तुम्हारा सेवक बने।" मार. 10:43.44) संत पापा ने कहा कि यह प्रभु का निमंत्रण है कलीसिया के अधिकारियों के लिए कि वे दूसरों की प्रतिष्ठा की रक्षा की क्षमता में बढ़ें, उन्हें अभियंजित करें, उनके घावों को चंगा करें और उनकी टूटी आशा को जगायें। इसका अर्थ यही है कि हम यहाँ इसलिए आये हैं ताकि हम दरिद्रों को सुसमाचार सुनायें, बन्दियों को मुक्ति का और अन्धों को दृष्टिदान का सन्देश दें, दलितों को स्वतन्त्र करें और प्रभु के अनुग्रह का वर्ष घोषित करें। (लूक. 4:18-19).

संत पापा ने नये कार्डिनलों को सम्बोधित कर कहा कि येरूसालेम की ओर इस यात्रा में प्रभु उनके आगे चलते हैं, उन्हें याद दिलाने के लिए कि अधिकार का एकमात्र विश्वसनीय रूप ख्रीस्त की सेवा के लिए, दूसरों के चरणों में बैठने से उत्पन्न होता है। यह अधिकार वहीं से आता है जहाँ येसु ने क्रूस पर झुकने से पहले, झुककर चेलों के पाँव धोये। यही सबसे बड़ा सम्मान है जो हमें प्राप्त होता है कि हम ख्रीस्त की प्रजा की सेवा करते हैं। उन लोगों में जो भूखे हैं, उपेक्षित, कैद, बीमार, पीड़ित, और ड्रग सेवन के आदी हैं। संत पापा ने कहा कि उनकी सेवा करने के लिए उन्हें उनके स्तर पर आने की आवश्यकता है और जब वे उन्हें खड़े होने में मदद करते हैं तब ही वे एक व्यक्ति को देख सकते हैं।


(Usha Tirkey)

28/06/2018 18:07