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चलना, प्रार्थना करना और मिलकर काम करना : यह एक महान मार्ग है, संत पापा

ख्रीस्तीय एकता वर्धक प्रार्थना सभा में प्रवचन देते हुए संत पापा फ्राँसिस - REUTERS

21/06/2018 16:22

जिनेवा, बृहस्पतिवार, 21 जून 2018 (रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने जिनेवा के ख्रीस्तीय एकता वर्धक केन्द्र में ख्रीस्तीय एकता वर्धक प्रार्थना में भाग लिया। प्रार्थना के दौरान संत पापा ने अपने प्रवचन में प्रतिभागियों को पवित्र आत्मा के अनुसार चलने के लिए आमंत्रित किया।

संत पापा ने कहा कि संत पौलुस ने गलातियों को, जो एक दूसरे से झगड़ते और आरोप लगाते थे, पवित्र आत्मा की प्रेरणा के अनुरुप जीवन बिताने और आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। 

चलना : हम मनुष्य लगातार चलते हैं। हम आपने जीवन में लगातार आगे बढ़ने के लिए बुलाये गये हैं। हमारी मां के गर्भ से और जीवन के हर स्तर पर, जब हम पहली बार घर छोड़ते हैं जब से लेकर इस संसार को छोड़ने तक हम लगातार चलते रहते और आगे बढ़ते रहते हैं। चलना ही हमारे जीवन का असली अर्थ बताता है, एक ऐसा जीवन जो आत्मनिर्भर नहीं है बल्कि हमेशा अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता जाता है।

चलना एक अनुशासन है, यह एक प्रयास है। इसके लिए दिन प्रति दिन धैर्य और अभ्यास की आवश्यकता होती है। हमें लक्ष्य को सामने रखते हुए बहुत सी चीजों का परित्याग कर आगे चलना पड़ता है अन्यथा हम भटक जाएंगे। चलना विनम्रता की भी मांग करता है। हमें कभी-कभी पीछे लौटकर उस मार्ग को देखने की आवश्यकता होती है। हमारी इस यात्रा में साथ चलने वाले साथी सहयात्रियों की चिंता करते हुए आगे बढ़ने से हम जीवन में प्रगति करते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने घर के चुप रहना पसंद करते हैं, वे यात्रा की जोखिमों का सामना किए बिना सुरक्षित रहना चाहते हैं। लेकिन यह क्षणिक सुरक्षा हमारे दिल की शांति और खुशी प्रदान करने में असमर्थ है। वह खुशी और शांति केवल खुद से बाहर जाकर पाई जा सकती है।

संत पापा ने कहा कि ईश्वर ने अब्राहाम को अपना देश छोडने और यात्रा के लिए निकलने की आज्ञा दी। उसी प्रकार मूसा, पेत्रुस, पौलुस और प्रभु के मित्र सभी लगातार चल रहे थे।  येसु स्वंय इसके उदाहरण हैं वे ही मार्ग हैं (सीएफ,योहन 14: 6) उन्होंने अपना दिव्य राज्य छोड़ दिया (सीएफ फिल 2: 6-7) और हमारे बीच चलने के लिए नीचे आ गये। ईश्वर और प्रभु होकर भी वे हमारे बीच आये और हमें रास्ता दिखाकर  पुनः अपने पिता के पास वापस लौट गये। उन्होंने हमें अपनी आत्मा दी, ताकि हम भी उनके पास चलने की ताकत रख सकें। जैसा कि पौलुस कहते हैं,“आत्मा में चलना।”

संत पापा ने कहा कि अगर हम अपनी यात्रा में आगे बढ़ते हैं पर दूसरों के लिए अपना हृदय द्वार बंद रखते हैं तो हम अपनी बुलाहट के अनुरुप जीवन नहीं बिताते हैं। संत पौलुस इस बात पर जोर देते हैं कि हमें बपतिस्मा में प्राप्त आत्मा के अनुरुप जीवन बिताना है अन्यथा हम "शरीर की इच्छाओं को संतुष्ट" करेंगे। (गला 5:16) हमारा स्वार्थ, भौतिक चीजों को पाने की इच्छा, हमें अपने साथियों से अलग कर देगी।  हम हमारी प्रवृत्तियों से प्रेरित, बेबुनियाद उपभोक्तावाद के दास बन जायेंगे और ईश्वर की आवाज़ धीरे-धीरे हमें सुनाई नहीं देगी। अन्य लोग, विशेष रूप से वे जो अपने आप नहीं चल सकते हैं, बच्चों और बुजुर्गों लोग आपके लिए भार स्वरुप बन जायेंगे।  

संत पापा ने कहा आज संत पौलुस हमें फिर से आत्मा में चलने हेतु चुनौती देते हैं। आत्मा में चलने का अर्थ है सांसारिकता को अस्वीकार करना। इसका मतलब है सेवा की मानसिकता का चयन करना और क्षमा में बढ़ना। इसका मतलब इतिहास में हमारे हिस्से को अंकित करना। विश्वव्याप्त भ्रष्टाचार से अपने आप अलग रखते हुए और उस मार्ग की ओर आगे बढ़ना जो हमें अपने पड़ोसी की ओर ले जाता है। हमारे लिए साइनपॉस्ट "एक आज्ञा है:"अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो। "(गला 5,14)। आत्मा का मार्ग उस मील के पत्थर से चिह्नित है जिसे संत पौलुस ने "प्रेम, खुशी, शांति, धैर्य, दयालुता, उदारता, विश्वास, नम्रता और आत्म-नियंत्रण" कहा है (पद, 22)।

हम सब उस मार्ग में चलने के लिए बुलाये गये हैं जहाँ लगातार मन परिवर्तन और सोचने के हमारे तरीके में नवीनीकरण हो, ताकि हमारा जीवन पवित्र आत्मा के अनुरूप हो सके।          अतीत में, ख्रीस्तीयों के बीच अक्सर विभाजन उत्पन्न हुए हैं क्योंकि उनकी जड़ पर, समुदायों के जीवन में, सांसारिक मानसिकता ने प्रवेश किया। सबसे पहले मसीह के लिए चिंता करने के बदले खुद की चिंता ने प्राथमिकता ली। एक बार ऐसा होने के बाद, ईश्वर और मनुष्य के दुश्मन को हमें विभाजित करने में कोई कठिनाई नहीं थी, क्योंकि जिस दिशा को हम ले रहे थे वह आत्मा का नहीं वरण शरीर था। यहां तक कि उन विभागों को समाप्त करने के कुछ पिछले प्रयास भी बुरी तरह विफल रहे क्योंकि वे मुख्य रूप से के सांसारिक सोच तरीके से प्रेरित थे। फिर भी अंतर कलीसियाई आंदोलन, जिस पर विश्व कलीसियाई परिषद ने पवित्र आत्मा की कृपा के रूप में इतना बड़ा योगदान दिया है।  (सीएफ यूनितातिस रेदिनग्राजियो,1)

इस बात पर आपत्ति उठाई जा सकती है कि इस तरह से एक साथ चलने पर हमारे कार्य में बाधायें आ सकती हैं, क्योंकि यह व्यक्तिगत समुदायों के हितों की पर्याप्त रूप से रक्षा नहीं करता है, जो अक्सर जातीय पहचान से जुड़ा होता है चाहे वह "रूढ़िवादी" या "प्रगतिशील" हो। अपोलो या केफास का चुनाव करने से पहले येसु का चुनाव (सीएफ 1 कुरि. 1:12); "यहूदी या ग्रीक" होने से पहले मसीह का होना (सीएफ गलाति 3:28); दाएं या बाएं के रुप में पहचाने जाने से पहले मसीह का होना तथा सुसमाचार के नाम पर खुद का चुनाव करने के बदले अपने भाई बहनों का चुनाव करना है। दुनिया की नजर में हमारा चुनाव निरर्थक और बेकार लगे, परंतु ईश्वर की नजरों में वही महान है। क्योंकि “जो अपना जीवन सुरक्षित रखना चाहता है वो इसे खो देगा और जो अपना जीवन खो देता है वो इसे सुरक्षित रखेगा।” (लूक 9:24)

संत पापा ने कहा, “विश्व अंतर कलीसियाई परिषद की इस सत्तरवीं सालगिरह पर, आइए हम पवित्र आत्मा को हमारे कदमों को मजबूत करने के लिए कहें। हम अपने मतभेदों के कारण आसानी से रुक गए थे; अक्सर हम उत्साह की कमी के कारण रुक जाते हैं। आत्मा में चलने हेतु हमारा मतभेद हमारे रास्ते में रुकावट न डाले। पवित्र अत्मा में हम एक साथ प्रार्थना कर सकते हैं, प्रचार कर सकते हैं और एक साथ सेवा कर सकते हैं। यह संभव है और यह ईश्वर को प्रसन्न करता है! चलना, प्रार्थना करना और साथ मिलकर काम करना: यह एक महान मार्ग है जिसे हम अनुसरण करने के लिए बुलाए गये हैं।”

इस पथ का एक स्पष्ट उद्देश्य है, एकता का। विभाजन के विपरीत पथ, संघर्ष और टूटने की ओर जाता है। ईश्वर ने हमें बातचीत के रास्ते पर अग्रसर किया है जो शांति की ओर जाता है। हमारी एकता की कमी वास्तव में "मसीह की इच्छा के विपरीत है, लेकिन यह दुनिया के लिए एक ठोकर भी है और सबसे पवित्र कारणों को नुकसान पहुंचाती है: हर प्राणी को सुसमाचार का प्रचार" (यूनिटैटिस रेडिन्टेग्रेटियो, 1)। ईश्वर हमसे एकता की मांग करते है; हमारी दुनिया,  बहुत से विभाजन में फंसी है जो एकता को कमजोर करती है।

संत पापा ने कहा कि वे एकता और शांति की खोज में एक तीर्थयात्री बनकर आये हैं। इस तीर्थयात्रा में वे सभी का साथ चाहते हैं। संत पापा ने सभी के लिए पवित्र आत्मा से कृपा मांगी कि सभी प्रभु के साथ मिलकर जीवन यात्रा में आगे बढ़े। येसु ने अपनी मृत्यु द्वारा अलगाव के सभी दिवारों को तोड़ दिया है और सभी शत्रुताएं खत्म हो गई हैं। (सीएफ एफे. 2:14)। उसमें, हम यह देखने पाएंगे कि, हमारी सभी असफलताओं के बावजूद, ईश्वर हमें कभी भी अपने प्यार से अलग नहीं करेंगे। (सीएफ, रोम 8: 35-39)। 


(Margaret Sumita Minj)

21/06/2018 16:22