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संत पापा फ्राँसिस \ मिस्सा व प्रवचन

ईश्वर का प्रेम केवल शब्दों में नहीं किन्तु ठोस कार्य से प्रकट होता है

09/06/2018 14:52

वाटिकन सिटी, शनिवार, 9 जून 2018 (वाटिकन न्यूज़)˸ ईश्वर का प्रेम असीम है। इन्हीं शब्दों पर संत पापा फ्राँसिस ने शुक्रवार को येसु के पवित्र हृदय महापर्व के उपलक्ष्य में ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में चिंतन केंद्रित किया।   

प्रवचन में उन्होंने कहा कि ईश्वर की महानता छोटी चीजों एवं कोमलता में प्रकट होती है। "ऐसा नहीं है कि हम पहले ईश्वर को प्यार करते हैं बल्कि इसके ठीक विपरीत, सबसे पहले वे हमें प्यार करते हैं।"

संत पापा ने कहा कि नबी बादाम के फूल का उदाहरण देते हैं जो इसका प्रतीक है क्योंकि यह बसंत ऋतु में सबसे पहले खिलता है। उन्होंने कहा, "ईश्वर उसी तरह हैं जो हमेशा आगे रहते हैं। वे पहले से हमारा इंतजार करते हैं और हमें मदद देते हैं।" फिर भी उनके प्रेम को समझना आसान नहीं है जैसा कि धर्मविधिक पाठ में बतलाया गया है जहाँ संत पौलुस गैरयहूदियों के बीच सुसमाचार के प्रचार को ख्रीस्त का बड़ा धन मानते हैं।

संत पापा ने कहा कि यह एक ऐसा प्रेम है जिसे समझा नहीं जा सकता। प्रेम जो हर ज्ञान को विस्मित करता है। यह हरेक को आश्चर्य चकित कर देता है। ईश्वर का प्रेम महान है। कवि इसे तट के बिना एक अथाह समुद्र के रूप में प्रकट करते हैं। इस प्रेम को समझने की आवश्यकता है क्योंकि हम इसे प्राप्त करते हैं।

संत पापा ने कहा कि पूरे मुक्ति इतिहास में प्रभु ने हमारे प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया। वे एक महान गुरू हैं।

नबी होसिया कहते हैं कि ईश्वर अपने प्रेम को शक्ति द्वारा प्रकट नहीं करते बल्कि प्रेम द्वारा प्रकट करते हैं, अपने लोगों को चलने की शिक्षा देते, उन्हें अपनी बाहों में लेते तथा उनकी देखभाल करते हैं।

ईश्वर किस तरह अपने प्रेम को प्रकट करते हैं? क्या वे इसे महान कार्यों में प्रकट करते हैं? नहीं, उन्होंने अपने को छोटा बनाया, कोमलता एवं अच्छाई का मनोभाव धारण कर अपने को दीन बनाया। वे अपने बच्चों के पास आये और अपने सामीप्य द्वारा उन्होंने प्रेम की महानता को प्रकट किया।

अंत में ईश्वर ने अपने पुत्र को भेजा जिन्होंने शरीर धारण किया और अपने को मृत्यु तक विनम्र बनाया। यही ईश्वर के प्रेम का रहस्य है उनकी महानता सबसे छोटी दीनता में प्रकट हुई। यही ख्रीस्तीयता को समझने में मदद देता है।

एक ख्रीस्तीय में किस तरह का मनोभाव होना चाहिए इसकी शिक्षा देते हुए येसु कहते हैं, कि हम ईश्वर के कार्य को अपने छोटे-छोटे कार्यों के माध्यम से आगे बढ़ायें अर्थात् भूखों को खिलाने, प्यासों को पिलाने, बीमारों को देखने जाने एवं कैदियों से मुलाकात करने के द्वारा उसे जारी रखें।

संत पापा ने कहा कि दया के कार्य प्रेम के पथ को प्रशस्त करते हैं जिसको येसु ने ईश्वर के प्रति बड़े प्रेम से पूरा करने की शिक्षा हमें दी है, केवल शब्दों से नहीं किन्तु अपने ठोस कार्यों द्वारा।

उन्होंने कहा कि प्रेम प्रकट करने के लिए हमें बड़ी-बड़ी वार्ताएँ करने की आवश्यकता नहीं है बल्कि जो लोग येसु एवं पिता ईश्वर के लिए छोटे छोटे कार्यों को करना जानते हैं वे ही उनके कार्यों को पूरा करते हैं। संत पापा ने कहा कि करुणा के हमारे कार्य उनके प्रेम को जारी रखते हैं।


(Usha Tirkey)

09/06/2018 14:52