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संत पापा फ्राँसिस \ मिस्सा व प्रवचन

जीवन में येसु से प्रथम मुलाकात की याद का महत्व

07/06/2018 16:43

वाटिकन सिटी, बृहस्वतिवार, 7 जून 18 (रेई)˸ वाटिकन स्थित प्रेरितिक आवास संत मर्था के प्रार्थनालय में बृहस्पतिवार 7 जून को, ख्रीस्तयाग अर्पित करते हुए प्रवचन में संत पापा फ्राँसिस ने कहा कि ख्रीस्तीय जीवन में आगे जाने के लिए हमें येसु से प्रथम मुलाकात को याद करना चाहिए।

संत पापा ने कहा, "ख्रीस्तीय यादगारी जीवन के नमक के समान है, वह पीछे मुड़ना है ताकि आगे बढ़ सकें। हमें उस पल की याद करनी चाहिए जिसमें येसु के साथ हमारी पहली मुलाकात हुई थी। हम उन लोगों की भी याद करें जिन्होंने हमें विश्वास को हस्तांतरित किया था तथा प्रेम के नियम की याद जिसको ईश्वर ने हमारे हृदयों में डाल दिया है।"

प्रवचन में संत पापा ने संत पौलुस द्वारा तिमोथी को लिखे पत्र से लिए गये पाठ पर चिंतन किया जिसमें कहा गया है, "ईसा मसीह को याद करें।" 

संत पापा ने कहा, "हमें येसु से मुलाकात की याद में पीछे जाना है ताकि हम बल प्राप्त कर सकें और आगे बढ़ सकें। ख्रीस्तीय स्मृति हमेशा ख्रीस्त के साथ एक मुलाकात है।"  

उन्होंने कहा कि चूँकि ख्रीस्तीय स्मृति एक नमक के समान है उसके बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। जब हम स्मृति को भूलने वाले ख्रीस्तीयों को पाते हैं तब हम देख सकते हैं कि उन्होंने ख्रीस्तीय जीवन का मिठास खो दिया है तथा वे दस आज्ञाओं का पालन तो करते हैं किन्तु येसु से मुलाकात के बिना। संत पापा ने कहा कि हमें जीवन में येसु से मुलाकात आवश्य करनी चाहिए।

संत पापा ने तीन परिस्थितियाँ बतलायीं जिनमें हम येसु से मुलाकात कर सकते हैं-

पहली मुलाकात हम अपने पूर्वजों एवं आज्ञाओं में करते हैं। इब्रानियों को लिखे पत्र में कहा गया है कि "मन-परिवर्तन के बाद उन आरम्भिक दिनों की याद करें, जब आप अत्यन्त उत्साही थे।" संत पापा ने कहा कि हम प्रत्येक के लिए एक ऐसा पल रहा है जिसमें हमने येसु से मुलाकात की है और हो सकता है कि हमने एक से अधिक बार येसु से मुलाकात की हो, जिसमें येसु ने हमें अपने आपको प्रकट किया। उन्होंने कहा कि हम उन क्षणों को न भूलें, बल्कि पीछे मुड़कर उनकी याद करें जिसमें हमने येसु से मुलाकात की थी क्योंकि इसके द्वारा हमें प्रेरणा मिलती है।

हम प्रत्येक के जीवन में ऐसा ही होता है जब हम येसु ख्रीस्त से मुलाकात करते हैं तो हमारा जीवन बदल जाता है, तब प्रभु हमें अपनी बुलाहट को प्रकट करते हैं। हमारी कठिनाईयों की घड़ी में जब प्रभु हमसे मुलाकात करते हैं तब हम उसे अपने हृदय में याद करते हैं। संत पापा ने उन अवसरों पर चिंतन करने का निमंत्रण देते हुए कहा कि वे हमारी ख्रीस्तीय यात्रा के स्रोत हैं ऐसा स्रोत जो हमें शक्ति प्रदान करते हैं।

येसु के साथ दूसरी मुलाकात की घड़ी हो सकती है पूर्वजों की याद, जिन्हें इब्रानियों के पत्र में कहा गया है, "तुम्हारे नेता जिन्होंने तुम्हें शिक्षा दी है।"

संत पापा ने कहा, "विश्वास को हमने किसी ईमेल द्वारा प्राप्त नहीं किया है किन्तु उन स्त्री पुरूषों द्वारा प्राप्त किया है जिन्हें विश्वास को हमारे लिए हस्तंतरित किया है इब्रानियों के पत्र में उनके बारे कहा गया है, उन्हें देखो वे असंख्य साक्षी हैं और वे उनसे बल प्राप्त करते हैं। उन्होंने शहादत प्राप्त की है।"

संत पापा ने स्मरण दिलाया कि जब जीवन का जल कम पड़ने लगते तो यह आवश्यक है कि हम स्रोत के पास जाएँ तथा आगे बढ़ने की शक्ति पुनः प्राप्त करें। हम अपने आप से पूछ सकते हैं, क्या मैं अपने पूर्वजों और नेताओं की याद करता हूँ। क्या मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसकी जड़ें मजबूत हैं? अथवा क्या मैं केवल वर्तमान में जी रहा हूँ? यदि ऐसा है तो हम तुरन्त ईश्वर से कृपा मांगे कि हम अपने मूल की ओर लौट सकें, जिन्होंने विश्वास को हमारे लिए प्रदान किया है।

अंततः संत पापा ने प्रेम की आज्ञा पर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि संत मारकुस के अनुसार पहली आज्ञा है, "इस्राएल सुनो, प्रभु ही हमारा ईश्वर है।"

उन्होंने कहा कि आज्ञा प्रेम का चिन्ह है जिसको प्रभु ने हमारे लिए दिया है क्योंकि उन्होंने हमें रास्ता दिखलाया है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार हम गलत रास्ते पर जाने से बच सकते हैं। आज्ञा को टालना अथवा उसे एक नियम मात्र के रूप में देखना नहीं चाहिए क्योंकि यह प्रेम का नियम है जिसे प्रभु ने हमारे हृदयों में डाला है।

संत पापा ने प्रश्न किया कि क्या हम आज्ञाओं के प्रति निष्ठावान हैं? उसे याद करते और क्या हम दुहराते हैं? कई बार ख्रीस्तीयों और यहाँ तक कि समर्पित लोगों को भी  प्रभु की दस आज्ञाओं को दुहराना मुश्किल हो जाता है। 

संत पापा ने कहा कि येसु ख्रीस्त को याद करने का अर्थ है जीवन के उन क्षणों पर गौर करना जिनमें हमने प्रभु से मुलाकात की थी, कठिनाइयों की घड़ी में, पुर्वजों में और नियमों में। याद करना केवल पीछे मुड़कर देखना नहीं है बल्कि आगे की ओर बढ़ना भी है। स्मृति एवं आशा एक साथ आगे बढ़ते हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं। हम येसु ख्रीस्त की याद करें जो हमारे बीच आये, हमारे लिए कीमत चुकाये तथा वे पुनः आयेंगे। वे स्मृति एवं आशा के ईश्वर हैं। वे स्मृति एवं आशा दोनों में मदद करते हैं। 

संत पापा ने विश्वासियों से आग्रह किया कि वे कुछ क्षण रूक कर, इस बात पर चिंतन करें कि वह याद कैसी है जिसमें मैंने प्रभु से मुलाकात की थी, मेरे पुर्वजों की याद एवं नियमों की याद। मेरी आशा कैसा है मैं किस पर आशा करता हूँ।

प्रभु हमें याद करने एवं आशा बनाये रखने में मदद करे।


(Usha Tirkey)

07/06/2018 16:43