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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 99

बाईबिल संग्रहालय का प्रवेश द्वार, वाशिंगटन, तस्वीर। 14.11.2018 - REUTERS

05/06/2018 10:55

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"प्रभु राज्य करता है। राष्ट्र भयभीत हों। वह केरूबों पर विराजमान है। पृथ्वी काँप उठे। प्रभु सियोन में महान है। वह सब राष्ट्रों से ऊँचा है। वे उसके विराट एवं श्रद्धेय नाम का गुणगान करें। प्रभु पवित्र है। शक्तिशाली न्यायप्रिय राजा! तूने अपरिवर्तनीय न्याय स्थापित किया, तू याकूब में निष्पक्षता से न्याय करता है। हमारे ईश्वर को धन्य कहो, उसके पावदान को दण्डवत करो। प्रभु पवित्र है।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 99 वें भजन के प्रथम पाँच पद। इन्हीं पदों की व्याख्या से विगत सप्ताह हमने पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम समाप्त किया था। 99 वें भजन का रचयिता मानों हताशा और निराशा से भरे लोगों को आश्वासन देता है कि वे प्रभु में अपने विश्वास को सुदृढ़ करें क्योंकि ईश्वर न्यायप्रिय राजा है। इस भजन का मुख्य बिन्दु हैं, “प्रभु ईश्वर पवित्र है”। मनुष्य अपवित्र हैं और ईश्वर पवित्र हैं। ईश्वर वही हैं जो हम नहीं हैं, वे हमारी पापमय प्रकृति से बिलकुल भिन्न हैं।

ईश्वर की पवित्रता के रहस्य का ध्यान करते हुए 99 वें भजन का रचयिता सम्पूर्ण विश्व में  अन्धाधुन्ध शासन करनेवाले राष्ट्रों से कहता है कि वे ईश्वर की पवित्रता के आगे नतमस्तक होवें। ईश्वर की पवित्रता के आगे पृथ्वी भी काँप उठे। वह याद दिलाता है कि मानव और प्रकृति दोनों यह सदैव स्मरण रखें कि ईश्वर के आगे वे कुछ भी नहीं हैं। प्रभु  ईश्वर "केरूबों पर विराजमान है" जिसका अर्थ है ग़ैरविश्वासियों द्वारा रची गयी मूर्तियाँ जिनकी वे पूजा करते थे। प्रभु ईश्वर राजा है जो सब देवी-देवताओं पर विराजमान हैं। वस्तुतः इस भजन के शब्दों में मनुष्य को याद दिलाया गया है कि वह ईश्वर की ही आराधना करे जो मनुष्यों के, इस प्रकृति के और पृथ्वी के समस्त शक्तिशाली सत्ताधारियों के राजा और न्यायकर्त्ता हैं। अस्तु, भजनकार का आग्रह है कि समस्त पृथ्वी और उसपर निवास करनेवाले लोग ईश्वर को धन्य कहें और उसके पावदान को दण्डवत करें।"

आगे 99 वें भजन के छः से लेकर 9 तक के पदों में भजनकार स्मरण दिलाता है, "हारून और मूसा उसके पुरोहित थे, सामुएल उसकी उपासना करता था। उन्होंने प्रभु को पुकारा और उसने उनकी सुनी। उसने बादल के खम्भे में से उन से बातें कीं। उन्होंने प्रभु की आज्ञाओं और नियमों का पालन किया। हमारे प्रभु ईश्वर तूने उनकी प्रार्थना सुनी। तूने उन्हें अपराध का दण्ड दिया, किन्तु उन्हें क्षमा भी प्रदान की। हमारे प्रभु ईश्वर को धन्य कहो। उसके पवित्र पर्वत को दण्डवत करो। हमारा प्रभु ईश्वर पवित्र है।"

श्रोताओ, प्राचीन व्यवस्थान के ग्रन्थों से हमें यह ज्ञान मिला है कि सदियों पूर्व इसराएलियों के पूर्वजों ने ईश्वर को पुकारा था तब प्रभु ने उनकी सुनी थी और उन्हें उत्तर दिया था। उनकी भक्ति और आराधना मध्यस्थ की आराधना थी क्योंकि उन्होंने अपने लिये नहीं अपितु अन्यों के लिये ईश्वर को पुकारा था। मूसा ने इसराएलियों के लिये प्रभु से प्रार्थना की थी जैसा कि हम गणना ग्रन्थ के 14 वें अध्याय के 13 से लेकर 19 तक के पदों में पढ़ते हैं, लिखा है, "इस पर मूसा ने प्रभु को उत्तर दिया, "मिस्री जानते हैं कि तू बड़े सामर्थ्य के साथ इस्राएलियों को उनके देश से निकाल लाया है। उन्होंने इस देश के लोगों को भी यह बात बता दी है। उन्होंने यह सुना है कि तू प्रभु, इस प्रजा के साथ रहता है और कि तू इन्हें दर्शन देता है, तू दिन में बादल के सदृश और रात में अग्नि के स्तम्भ रूप में इनके आगे-आगे चलता है। अब यदि तू इन लोगों का पूर्ण रूप से विनाश करेगा, तो वे राष्ट्र, जिन्होंने तेरी कीर्ति सुनी है, यह कहेंगे कि प्रभु इन लोगों को इस देश में ले जाने में असमर्थ रहा।... इसलिये प्रभु अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन कर और अपनी महान दया के अनुरूप इन लोगों का अपराध क्षमा कर, जैसा कि तू मिस्र से यहाँ तक करता आया है।"  

इस प्रकार श्रोताओ, मूसा, हारून तथा समुएल जैसे उनके युग के महान ईशभक्त अग्रगणियों ने लोगों की ओर से ईश्वर को अपने तन-मन-धन से ईश्वर को पुकारा था और ईश्वर ने उनकी प्रार्थनाएँ सुनी थीं। ईश्वर उनके समक्ष बादलों में प्रकट हुए थे। निर्गमन ग्रन्थ के 13 वे अध्याय के 21 वें पद में हम पढ़ते हैं, "प्रभु दिन में उन्हें रास्ता दिखाने के लिये बादल के खम्बे के रूप में और रात में उन्हें प्रकाश देने के लिये अग्नि स्तम्भ के रूप में आगे-आगे चलता था, जिससे वे दिन में और रात में भी यात्रा कर सकें।" इसके बदले मूसा और हारून जैसे लोगों ने प्रतिज्ञा की थी कि वे ईश्वर का परित्याग कभी नहीं करेंगे, उन्हीं में अपने विश्वास की अभिव्यक्ति करेंगे तथा ईश्वर की इच्छानुकूल अपना जीवन यापन करेंगे।

श्रोताओ, मूसा, हारून तथा समुएल जैसे प्राचीन व्यवस्थान के महान ईशभक्तों ने ईश्वर की पवित्रता को समझ लिया था, उन्होंने ईश्वर अद्वितीयता के पहचान लिया था और इसीलिये इतने विश्वास के साथ वे अपने लोगों की ओर से ईश्वर को पुकारते रहे थे। वे ऐसा कर सके क्योंकि उन्होंने यह पूर्णरूपेण समझ लिया था कि ईश्वर पवित्र होने के साथ- साथ दयालु एवं क्षमावान ईश्वर थे, उन क्षणों में भी जब ईश्वर ने इसराएलियों को उनके पापों के लिये दण्डित किया था। गणना ग्रन्थ के 14 वें अध्याय के 20 वें पद में लिखा है, "इस पर प्रभु ने कहा, "मैं तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर उन्हें क्षमा करता हूँ।" अस्तु, श्रोताओ, 99 वें भजन का रचयिता इस गीत के द्वारा युगयुगान्तर के लोगों का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित कराता है कि प्रभु ईश्वर पवित्र हैं और उनके पवित्र होने का अर्थ हैं मनुष्यों के प्रति ईश्वर का असीम प्रेम और उनकी अपार दया। इसायाह के ग्रन्थ में भी ईश्वर में विश्वास करनेवालों को यही आश्वासन मिला है, इस ग्रन्थ के 49 वें अध्याय के छठवें पद में लिखा है, "मैं तुम्हें राष्ट्रों की ज्योति बना दूँगा, जिससे मेरा मुक्ति विधान पृथ्वी के सीमान्तों तक फैल जाये।"


(Juliet Genevive Christopher)

05/06/2018 10:55