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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 97-98

वाटिकन के सन्त मर्था प्रार्थनालय में सन्त पापा के ख्रीस्तयाग के दौरान प्रदर्शित पवित्र बाईबिल

22/05/2018 09:55

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"प्रभु-भक्तो!  बुराई से घृणा करो! प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करता है और उन्हें दुष्टों के पंजों से छुड़ाता है। धर्मी के लिये ज्योति का उदय होता है, निष्कपट लोग आनन्द मनाते हैं। धर्मियो! प्रभु में आनन्द मनाओ! उसके पवित्र नाम को धन्य कहो।"

ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 97 वें भजन के अन्तिम तीन पद। विगत सप्ताह पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने इन्हीं पदों की व्याख्या की थी। 97 वें भजन में सर्वोच्च ईश्वर की महिमा का बखान किया गया है। इस भजन में देवमूर्तियों की पूजा करनेवालों तथा मूर्तियों पर गौरव करनेवालों को चेतावनी भी दी गई है कि उन्हें निराश होना पड़ेगा। इसलिये कि केवल प्रभु ईश्वर ही पृथ्वी के एकमात्र स्वामी और सृष्टिकर्त्ता हैं। भजनकार कहता है, "ईश्वर, तू समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है। तू ही सभी देवताओं से महान है।"

श्रोताओ, lभजन के अन्तिम तीन पदों में भजनकार समस्त ईश भक्तों को प्रभु ईश्वर की छत्रछाया में रहकर सुरक्षा पाने का आश्वासन देता है। वह बुराई से घृणा का केवल परामर्श नहीं देता बल्कि बुराई के परित्याग का आदेश देता है कि वे सभी बुराईयों से दूर रहें इसलिये कि प्रभु अपने भक्तों की रक्षा  करते हैं। वे भक्तों को दुष्टों के पंजों से छुड़ाते हैं इसलिये कि भक्त ख़ुद यह कार्य नहीं कर सकते। कहता है कि धर्मी के लिये ज्योति का उदय होता है। भले ही बुराई उसके इर्द-गिर्द मंडराती रहे, बुराई का उसपर कोई असर नहीं होगा क्योंकि बुराई के बावजूद ईश्वर राज्य करते हैं, वे कण-कण में विद्यमान हैं, वे मानव मन के अन्तर में विद्यमान हैं। बुराई और निराशा के अंधकार में धर्मियों के लिये ईश्वर, ज्योति के सदृश, उदित होते और भक्तों की रक्षा करते हैं, इसीलिये ईश भक्तों को आमंत्रित करता है कि वे ईश्वर में आनन्द मनायें। कहता है, धर्मियो! प्रभु में आनन्द मनाओ! उसके पवित्र नाम को धन्य कहो।"

और अब आइये स्तोत्र ग्रन्थ के 98 वें भजन पर दृष्टिपात करें। इस भजन में प्रभु ईश्वर को पृथ्वी का न्यायकर्त्ता घोषित किया गया है। भजन के प्रथम तीन पद इस प्रकार हैं, "प्रभु के आदर में नया गीत गाओ, उसने अपूर्व कार्य किये हैं। उसके दाहिने हाथ, उसकी पवित्र भुजा ने विजय पायी है। प्रभु ने अपना मुक्ति विधान प्रकट किया। उसने राष्ट्रों के लिये अपना न्याय प्रदर्शित किया है। उसने अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान कर इस्राएल के घराने की सुधि ली है। पृथ्वी के कोने-कोने में हमारे ईश्वर का मुक्ति विधान प्रकट हुआ है।"  

श्रोताओ, शताब्दियों के अन्तराल में माता कलीसिया उक्त भजन के द्वारा ख्रीस्तीय धर्मानुयायियों को प्रभु के आदर में नया गीत गाने के लिये आमंत्रित करती रही है ताकि ईश्वर के आदर सदैव और निरन्तर नया गीत गाया जाये, हर युग में नया गीत गाया जाये। भजनकार घोषित करता है कि प्रभु ने महान कार्य किये हैं। ईश्वर के कार्य अपूर्व हैं जो विज्ञान की समझ से भी परे हैं। नबी इसायाह के ग्रन्थ के 40 वें अध्याय के 28 वें पद में हम पढ़ते हैं, "प्रभु अनादि और अनन्त ईश्वर है, वह समस्त पृथ्वी का सृष्टिकर्त्ता है। वह कभी क्लान्त अथवा विश्रान्त नहीं होता। कोई भी उसकी प्रज्ञा की थाह नहीं ले सकता।" और फिर इसायाह के ग्रन्थ के 45 वें अध्याय के 01 से लेकर सात तक के पदों में सीरूस यानि पारस के राजा के अभिषेक तथा राष्ट्रों को उसके अधीन करने की चर्चा है ताकि लोग यह जान जायें कि ईश्वर ने अपनी प्रजा इसराएल को मुक्ति दिलाने तथा उन्हें अपने घर जैरूसालेम लौटाने के लिये उस युग में विश्व के अत्यधिक शक्तिशाली राजा का उपयोग किया था। इसायाह के ग्रन्थ के 40 वें अध्याय के पहले पद में नबी कहते हैं, "तुम्हारा ईश्वर यह कहता है, मेरी प्रजा को सान्तवना दो। जैरूसालेम को ढारस बँधाओ और पुकार कर उसे यह कहो कि उसकी विपत्ति के दिन समाप्त हो गये हैं।"  

बाईबिल आचार्यों का मानना है कि स्तोत्र ग्रन्थ का 98 वें वाँ भजन ईसा पूर्व 539 वें वर्ष में जैरूसालेम के मन्दिर के निर्माण के समय रचा गया था जो बाद में लोक भक्ति का केन्द्र बना था। नवीन मन्दिर के निर्माण से एक नवीन स्थिति बनी थी जिसमें ईशभक्त एकत्र हुए और उन्होंने ईश्वर के आदर में नया गीत गाया। अब भजनकार चाहता है कि हम भी प्रभु ईश्वर के महान कार्यों को पहचानें और उनके आदर में नया गीत गायें और पृथ्वी के कोने कोने तक उनके न्याय और मुक्ति विधान की उदघोषणा करें।

आगे 98 वें भजन के दूसरे भाग में भी भजनकार प्रभु का जयकार करने हेतु हम सब को आमंत्रित करता है। ये पद इस प्रकार हैं, "समस्त पृथ्वी प्रभु का जयकार करे और आनन्द मनाते हुए भजन गाये। वीणा बजाते हुए प्रभु के आदर में भजन गाकर सुनाओ। तुरही और नरसिंघा बजाते हुए अपने प्रभु ईश्वर का जयकार करो। समुद्र की लहरें गरजने लगें, पृथ्वी और उसके निवासी जयकार करें, नदियाँ तालियाँ बजायें और पर्वत आनन्दित हो उठे क्योंकि प्रभु पृथ्वी का न्याय करने आ रहा है। वह न्यायपूर्वक संसार का न्याय करेगा। वह निष्पक्ष होकर राष्ट्रों का न्याय करेगा।"

श्रोताओ, इन शब्दों में प्रभु ईश्वर को निष्पक्ष न्यायकर्त्ता घोषित किया गया है। ईश भक्तों को मिला यह सर्वाधिक अनमोल वरदान है कि सांसारिक शक्तियाँ जो भी करें वे ईश्वर के न्याय पर भरोसा कर सकते हैं, यदि ईश्वर पर उनका विश्वास मज़बूत है और यदि वे ईश्वर के नियमों पर चल अपना जीवन यापन करते हैं तो उन्हें संसार की शक्तियों से भय खाने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि ईश्वर उन्हें न्याय दिलानेवाले हैं। ईश्वर ही हैं परम न्यायकर्त्ता इसलिये ईशभक्त आनन्द मनाते हुए प्रभु ईश्वर का जय-जयकार करें।


(Juliet Genevive Christopher)

22/05/2018 09:55