Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

महत्त्वपूर्ण लेख \ पत्र

पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 97

यर्दन नदी के किनारे बाईबिल की प्रति हाथ में लिये एक ख्रीस्तीय पुरोहित - AFP

15/05/2018 11:19

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"प्रभु राज्य करता है। पृथ्वी पर उल्लास हो। असंख्य द्वीप आनन्द मनायें। अन्धकारमय बादल उसके चारों ओर मंडराते हैं। उसका सिंहासन धर्म और न्याय पर आधारित है। अग्नि उसके आगे-आगे चलती और उसके शत्रुओं को चारों ओर जलाती है। उसकी बिजली संसार पर चमकती है, पृथ्वी यह देखकर काँपने लगती है। पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर पर्वत मोम की तरह पिघलने लगते हैं। आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा के दर्शन करते हैं।" 

ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 97 वें भजन के प्रथम छः पद। विगत सप्ताह पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम हमने इन्हीं पदों की व्याख्या की थी। 97 वें भजन में सर्वोच्च ईश्वर की महिमा का बखान किया गया है। इस तथ्य पर हम ग़ौर कर चुके हैं कि स्तोत्र ग्रन्थ का 96 वाँ एवं 97 वाँ भजन समान प्रतीत होते हैं हालांकि ये दोनों भिन्न-भिन्न भजन हैं। 96 वाँ भजन प्रभु के अपूर्व कार्यों का स्मरण दिलाता है जबकि 97 वाँ भजन भविष्य की ओर हमें अभिमुख करता है। 96 वें भजन में ईश प्रजा की मुक्ति के लिये प्रभु का गुणगान किया गया है तो 97 वाँ भजन प्रभु ईश्वर को पृथ्वी के एकमात्र स्वामी और राजा घोषित करता है।

"प्रभु राज्य करता है", इन शब्दों से भजन शुरु होता है। वस्तुतः, "प्रभु" शब्द, ईश्वर के लिये प्रयुक्त, एक विशिष्ट नाम है। उन ईश्वर का जिन्हें वर्णित करने के लिये भजनकार कहता है, उसके ओर-छोर अन्धकारमय बादल मंडराते रहते हैं, अग्नि उसके आगे-आगे चलती है, उसकी बिजली संसार पर चमकती है। भजनकार कहता है कि "पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर" वे लोग भयभीत होंगे जो उनपर विश्वास नहीं करते तथा उनकी आज्ञाओं पर नहीं चलते हैं, जबकि वे लोग जो प्रभु में विश्वास कर उनके आदेशों के अनुकूल अपना जीवन यापन करते हैं वे ईश्वर के आगमन पर प्रसन्न होंगे और उल्लास के गीत गायेंगे। वे आनन्द मनायेंगे इसलिये कि प्रभु का सिंहासन धर्म और न्याय पर आधारित है, वे हर्षित हो उठेंगे क्योंकि "पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर पर्वत मोम की तरह पिघलने लगते हैं। आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा के दर्शन करते हैं।"

97 वें में उन लोगों को भी चेतावनी दी गई है जो देवमूर्तियों की पूजा करते हैं, जो मूर्तियों पर गौरव करते हैं। भजनकार कहता है कि देवमूर्तियों की पूजा करनेवालों को निराश होना पड़ेगा। उन लोगों को भी जो स्वतः को देवता घोषित करते हैं। और फिर भजन के आठवें और नवे पदों में कहता है, "प्रभु! तेरे निर्णय सुनकर सियोन आनन्दित हो उठता है, याकूब के गाँव उल्लास के गीत गाते हैं; क्योंकि तू समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है। तू ही सभी देवताओं से महान है।"

श्रोताओ, इस भजन में देवमूर्तियों को व्यर्थ निरूपित कर भजनकार इस बात के प्रति ध्यान आकर्षित कराता है कि आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है और सभी राष्ट्र उसकी महिमा के दर्शन करते हैं। नबी इसायाह के ग्रन्थ के 46 वें अध्याय में भी देवमूर्तियों को अपने उपासकों की रक्षा करने में असमर्थ बताया गया है। इसी प्रकार इस ग्रन्थ के 44 वें अध्याय में नबी इसायाह देवताओं और देवमूर्तियों के परित्याग एवं ईश्वर की शरण जाने हेतु आग्रह करते हुए नवे पद में कहते हैं, "जो मूर्तियाँ बनाते हैं, उनका कोई महत्व नहीं। जिन देवताओं पर उन्हें विश्वास है, उनसे कोई लाभ नहीं। उनके समर्थक कुछ नहीं देख सकते, कुछ नहीं जानते और उन्हें लज्जित होना पड़ेगा।"

ईश्वर, तू समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है। तू ही सभी देवताओं से महान है। प्रभु के निर्णय सुनकर सियोन आनन्दित होता उठता है और याकूब के गाँव उल्लास के गीत गाते हैं। यहाँ सियोन से तात्पर्य ईश्वर के पवित्र धाम से है, पृथ्वी के निवासियों के लिये सियोन प्रभु का पवित्र निवास स्थान बना। वास्तव में यह जैरूसालेम का ईशशास्त्रीय नाम बना। अस्तु, जैरूसालेम, उसके आस-पड़ोस के समस्त क्षेत्र और सम्पूर्ण धरती आनन्दित हो उठती है क्योंकि ईश्वर पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है, आकाश जिनका न्याय घोषित करता है।  

आगे 97 वें भजन के अन्तिम तीन पदों में भजनकार समस्त ईश भक्तों को प्रभु ईश्वर की छत्रछाया में रहकर सुरक्षा पाने का आश्वासन देता है। ये पद इस प्रकार हैं, "प्रभु-भक्तो!  बुराई से घृणा करो! प्रभु अपने भक्तों की रक्षा करता है और उन्हें दुष्टों के पंजों से छुड़ाता है। धर्मी के लिये ज्योति का उदय होता है, निष्कपट लोग आनन्द मनाते हैं। धर्मियो! प्रभु में आनन्द मनाओ! उसके पवित्र नाम को धन्य कहो।"

ईश्वर से प्रेम करनेवालों को भजनकार बुराई से घृणा का केवल परामर्श नहीं देता बल्कि बुराई के परित्याग का आदेश देता है कि वे सभी बुराईयों से दूर रहें इसलिये कि प्रभु अपने भक्तों की रक्षा  करते हैं। वे भक्तों को दुष्टों के पंजों से छुड़ाते हैं इसलिये कि भक्त ख़ुद यह कार्य नहीं कर सकते। भजनकार कहता है कि धर्मी के लिये ज्योति का उदय होता है। भले ही बुराई उसके इर्द-गिर्द मंडराती रहे, बुराई का उसपर कोई असर नहीं होगा क्योंकि बुराई के बावजूद ईश्वर राज्य करते हैं, वे कण-कण में विद्यमान हैं, वे मानव मन के अन्तर में विद्यमान हैं। बुराई और निराशा के अंधकार में धर्मियों के लिये ईश्वर, ज्योति के सदृश, उदित होते और भक्तों की रक्षा करते हैं। इसीलिये भजनकार कहता है, धर्मियो! प्रभु में आनन्द मनाओ! उसके पवित्र नाम को धन्य कहो।"

15/05/2018 11:19