Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

संत पापा फ्राँसिस \ मिस्सा व प्रवचन

हमारा "लक्ष्य" येसु के मित्रों के रूप में जीना है, संत पापा फ्राँसिस

संत मार्था के प्रार्थनालय में प्रातःकलीन युखारीस्तीय समारोह के दौरान प्रवचन देते हुए संत पापा फ्राँसिस

14/05/2018 15:52

वाटिकन सिटी, सोमवार 14 मई 2018 (रेई) : “येसु की मित्रता हमें संयोगवश नहीं अपितु "सौभाग्य" से प्राप्त हुई है और हमें येसु के मित्र के रुप में अपनी बुलाहट को जीना है।” यह बात संत पापा फ्राँसिस ने सोमवार को वाटिकन में अपने प्रेरितिक निवास संत मार्था के प्रार्थनालय में प्रातःकलीन युखारीस्तीय समारोह के दौरान कही।

हमारा "लक्ष्य" येसु के मित्रों के रूप में जीना है

संत पापा ने कहा,“यह हमारा सौभाग्य है कि हमें उपहार के रुप में येसु से दोस्ती मिली है और इस मित्रता को बरकरार रखते हुए इसे जीना ही हमारी बुलाहट है। येसु के प्रेरितों को यह उपहार मिला था  आज हम ख्रीस्तीयों को भी यह उपहार मिला है। हमें येसु की मित्रता को खुले दिल से स्वीकार करना है। हमारा "लक्ष्य" येसु के मित्रों के रूप में जीना है। यह वह उपहार है जिसे येसु देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और इस उपहार के प्रति वे वफादार रहते हैं।

येसु विश्वासघात करने वालों के साथ भी अपनी दोस्ती से इंकार नहीं करते है

संत पापा ने कहा, हालांकि कई बार हम "हमारे पापों के कारण तथा अपनी सनकीपन के कारण येसु से दूर चले जाते हैं, लेकिन "येसु अपने मित्रों के प्रति वफादार हैं।"  आज के सुसमाचार पाठ (योहन 15, 9 -17)  में येसु हमें नौकर नहीं परंतु मित्र कहते हैं और अपनी दोस्ती को वे अंत तक निभाते हैं क्योंकि वे वफादार हैं। येसु ने यूदस को विश्वासघात करने से पहले, आखिरी शब्द "दोस्त" कहकर संबोधित किया। उसे कभी नहीं दुतकारा।

येशु हमारा मित्र है। यूदस ने येसु की मित्रत्रा को ठुकरा दिया और येसु से दूर चला गया। उसने अपनी नियति के लिए स्वतंत्र रूप से चुनाव किया। दुर्भाग्य से अपने गलत चुनाव के कारण वह येसु से दूर हो गया। वह मित्र के बदले दुश्मन और गद्दार बन गया।  

येसु की मित्रता में रहना एक उपहार है

संत पापा ने आज के पहले पाठ (प्रेरितों 1.15-17.20-26) के संदर्भ में कहा कि "पुनरुत्थान का गवाह बनने" के लिए यूदस के स्थान में मतियस को चुना जाता है। मित्र अपने रहस्यों को साझा करता है। सुसमाचार में येसु कहते हैं,“मैंने तुम्हें मित्र कहा है क्योंकि मैंने पिता से जो कुछ सुना,वह सब तुम्हें बता दिया है। येसु की मित्रता हमें उपहार के रुप में मिली है। यह उपहार मतियस और यूदस को भी मिली थी।

प्रवचन के अंत में संत पापा ने येसु की मित्रता पर गंभीरता से विचार करने हेतु प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि येसु हमारी दोस्ती से कभी इन्कार नहीं करते, वे हमारा इन्तजार करते हैं और जब हम अपनी कमजोरी के कारण उससे दूर हो जाते हैं, तो भी वे हमारा इंतजार करते हैं क्योंकि वे अपने मित्रों के प्रति सदा वफादार  हैं। आइये हम प्रभु से सच्ची मित्रता निभाने और वफादार बने रहने के लिए कृपा मांगे।


(Margaret Sumita Minj)

14/05/2018 15:52