Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

महत्त्वपूर्ण लेख \ पत्र

पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 96-97

इसराएली अधिकृत पश्चिमी तट पर बाईबिल का पाठ करता एक व्यक्ति, तस्वीरः 04.01.2018 - REUTERS

08/05/2018 11:20

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"स्वर्ग में आनन्द और पृथ्वी पर उल्लास हो, सागर की लहरें गर्जन करने लगें, खेतों के पौधे खिल जायें और वन के सभी वृक्ष आनन्द का गीत गायें; क्योंकि प्रभु का आगमन निश्चित्त है, वह पृथ्वी का न्याय करने आ रहा है। वह धर्म और सच्चाई से संसार के राष्ट्रों का न्याय करेगा।"

प्रभु ईश्वर ने मानव के हित में सृष्टि की रचना की है इसलिये भजनकार का आग्रह है कि स्वर्ग में जिस तरह आनन्द है उसी प्रकार पृथ्वी भी उल्लसित हो। सबकुछ पर ईश्वर का नियंत्रण है, ईश्वर  सब कुछ को नया करते रहते हैं। पृथ्वी आनन्द मनायें क्योंकि जो कुछ इस पृथ्वी पर है वह सबकुछ मनुष्य के ख़ातिर रचा गया है। पृथ्वी आनन्द मनायें क्योंकि प्रभु ईश्वर प्रकृति को नित्य नया करते और बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर उसे एक शांतिपूर्ण राज्य में परिवर्तित कर देते हैं। संघर्षों से घिरे और अव्यवस्थित स्थलों पर वे कानून और व्यवस्था कायम करते क्योंकि उनके कार्य अपूर्व हैं, उनकी सभी गतिविधियाँ पूर्ण हैं, ईश्वरीय हैं और इनमें सहभागी होने के लिये वे हम सबको आमंत्रित करते हैं। प्रभु नित्य इस पृथ्वी पर आते रहते हैं, वे पृथ्वी के कण-कण में समाये हुए हैं इसीलिये भजनकार कहता है, प्रभु का आगमन निश्चित्त है, वह पृथ्वी का न्याय करने आ रहा है। वह धर्म और सच्चाई से संसार के राष्ट्रों का न्याय करेगा।"

और अब आइये स्तोत्र ग्रन्थ के 97 वें भजन पर दृष्टिपात करें। इस भजन में सर्वोच्च ईश्वर की महिमा का बखान किया गया है। हालांकि, स्तोत्र ग्रन्थ का 96 वाँ एवं 97 वाँ भजन एक ही रचयिता द्वारा रचा गया भजन प्रतीत होता है तथापि, ये दोनों भजन भिन्न-भिन्न हैं। 96 वें भजन में भजनकार प्रभु के अपूर्व कार्यों का स्मरण दिलाता है जबकि 97 वाँ भजन में भविष्य की ओर हमारी दृष्टि को अभिमुख करता है। इस भजन में हमें भविष्यवाणी मिलती है। प्रभु ईश्वर क्या करनेवाले हैं उसपर चर्चा की गई है। 96 वें भजन में स्मरण दिलाया गया है कि प्रभु ने अपनी प्रजा को किस प्रकार परदेश की दासता से मुक्त कर प्रतिज्ञात देश में जाने दिया और उन्हें सुरक्षित रखा। 97 वें भजन में भजनकार याद दिलाता है कि प्रभु ईश्वर ही पृथ्वी के स्वामी एवं पृथ्वी के राजा हैं उनके आगे कोई राजा, कोई देवता नहीं।

इस भजन के प्रथम छः पद इस प्रकार हैं, "प्रभु राज्य करता है। पृथ्वी पर उल्लास हो। असंख्य द्वीप आनन्द मनायें। अन्धकारमय बादल उसके चारों ओर मंडराते हैं। उसका सिंहासन धर्म और न्याय पर आधारित है। अग्नि उसके आगे-आगे चलती और उसके शत्रुओं को चारों ओर जलाती है। उसकी बिजली संसार पर चमकती है, पृथ्वी यह देखकर काँपने लगती है। पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर पर्वत मोम की तरह पिघलने लगते हैं। आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा के दर्शन करते हैं।"  

यह भजन "प्रभु राज्य करता है", शब्दों से शुरु होता है, और इस बात की पुष्टि करता है कि प्रभु राजा हैं। यह सच है कि प्रभु ईश्वर राजा है किन्तु पृथ्वी के सब निवासी इस तथ्य पर विश्वास नहीं करते। भजनकार इस बात पर बल देता है कि प्रत्येक व्यक्ति यह जान ले कि ईश्वर ही राजा हैं। वस्तुतः, "प्रभु" शब्द, ईश्वर के लिये प्रयुक्त, एक विशिष्ट नाम है। ईश प्रजा इसी नाम से अपने सृष्टिकर्त्ता को पुकारती है। उस सृष्टिकर्त्ता को जिसके ओर-छोर अन्धकारमय बादल मंडराते, जिसके आगे-आगे अग्नि चलती और जिसकी बिजली संसार पर चमकती है। उसी सृष्टिकर्त्ता ईश्वर से ईश प्रजा प्रेम करती तथा उनकी आज्ञाओं का पालन करती है।

श्रोताओ, भजन के उक्त पदों में ईश्वर के वैभव को बादल के मंडराने और बिजली के चमकने जैसा दर्शाया गया है। काले घने बादलों के गर्जन और बिजली के चमकने से निकलती अग्नि कई लोगों के लिये भयाक्रान्त होती है। हालांकि यह कुछ ही क्षणों के लिये होता है किन्तु कुछ लोग भयभीत हो उठते हैं। भजनकार कहता है कि "पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर" वे लोग भयभीत होंगे जो उनपर विश्वास नहीं करते तथा उनकी आज्ञाओं पर नहीं चलते हैं, जबकि वे लोग जो प्रभु में विश्वास कर उनके आदेशों के अनुकूल अपना जीवन यापन करते हैं वे ईश्वर के आगमन पर प्रसन्न होंगे और उल्लास के गीत गायेंगे। वे आनन्द मनायेंगे इसलिये कि प्रभु का सिंहासन धर्म और न्याय पर आधारित है, वे हर्षित हो उठेंगे क्योंकि "पृथ्वी के अधिपति के आगमन पर पर्वत मोम की तरह पिघलने लगते हैं। आकाश प्रभु का न्याय घोषित करता है। सभी राष्ट्र उसकी महिमा के दर्शन करते हैं।"      

आगे, 97 वें भजन के सात से लेकर नौ तक के पदों में भजनकार कहता है, "जो लोग देवमूर्तियों की पूजा करते हैं, जो उन मूर्तियों पर गौरव करते हैं, उन्हें निराश करते हैं, उन्हें निराश होना पड़ेगा। सभी देवताओ! प्रभु को दण्डवत् करो। प्रभु! तेरे निर्णय सुनकर सियोन आनन्दित हो उठता है, याकूब के गाँव उल्लास के गीत गाते हैं; क्योंकि तू समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है। तू ही सभी देवताओं से महान है।"

श्रोताओ, उस युग में और विशेष रूप से यूदा के आस-पास के देशों में कई देवताओं को पूजा जाता था। प्रायः लोग पत्थरों से या काठ से अपने देवता बना लेते थे तथा उनकी पूजा करते थे। इन्हीं को देवमूर्तियाँ कहा गया है। वस्तुतः इब्रानी भाषा में "मूर्ति" शब्द का अर्थ है शून्य अथवा कुछ भी नहीं। यूदा में इब्रानी भाषा ही बोली जाती थी और इब्रानी भाषा में "मूर्ति" शब्द का अर्थ हुआ करता था मिथ्या देवता। ये देवमूर्तियाँ ईश्वर नहीं थीं क्योंकि ईश्वर तो एक ही है और उन्हीं की आराधना की जाये और उन्हीं स्तुति की जाये क्योंकि ईश्वर ही समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च प्रभु है, ईश्वर ही सभी देवताओं से महान है।"


(Juliet Genevive Christopher)

08/05/2018 11:20