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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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संत पापा फ्राँसिस \ आमदर्शन व धर्मशिक्षा

बपतिस्मा संस्कार, बुराई पर विजयी होने की शक्ति देता

संत पापा फ्राँसिस, बुधवारीय आमदर्शन में - REUTERS

25/04/2018 17:14

वाटिकन सिटी, बुधवार, 25 अप्रैल 2018 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने अपने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व के विभिन्न देशों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों को बपतिस्मा संस्कार पर अपनी धर्मशिक्षा देते हुए कहा, प्रिय भाइयो एवं बहनों, सुप्रभात।

हम ईश वचनों के दिव्य आलोक में बपतिस्मा संस्कार पर अपनी धर्मशिक्षा को जारी रखते हैं। ये सुसमाचार के वचन हैं जो दीक्षार्थियों को प्रकाशित करते और उन्हें अपने विश्वास में सबल होने हेतु मदद करते हैं। बपतिस्मा विशेष रूप में हमारे लिए “विश्वास का संस्कार है”, क्योंकि यह हमारे विश्वास के कारण अन्य संस्कारों के लिए एक द्वार बनता है। विश्वास, अपने आप को येसु ख्रीस्त के हाथों में सुपुर्द करना है जो हमारे लिए पुनरूत्थान और अनंत जीवन, दुनिया की ज्योति हैं जैसे कि आज भी दीक्षांत की धर्मविधि हेतु दी जाने वाली धर्मशिक्षा में हमें बतलाई जाती है। येसु ख्रीस्त की शिक्षा, उनके कार्यों और वचनों को सुन कर दीक्षार्थीगण अपने जीवन में समारी स्त्री की अनुभूति से अपने को रुबरू होता हुए पाते हैं जोकि जीवन जल के लिए प्यासी है। वे अपने को जन्मांध व्यक्ति के अनुभवों में सम्मिलित होता हुए पाते हैं जो जीवन को देखने की चाह रखता है। वे लाजरूस की भांति अपनी मृत्यु की कब्र से बार निकलते हैं। संत पापा फाँसिस ने कहा कि सुसमाचार अपने में उस शक्ति से भर है जो उन लोगों के जीवन में परिवर्तन लाता है जो विश्वास के साथ इसे धारण करते हैं। यह विश्वास उन्हें बुराई से बाहर निकलने में मदद करता है और वे अपने जीवन में नई ऊर्जा का अनुभव करते हुए खुशी से ईश्वर की सेवा करने में सामर्थ होते हैं।

बपतिस्मा के दौरान हम अपने में अकेले नहीं होते हैं वरन सारी कलीसिया हमारे साथ रहती और हमारे लिए प्रार्थना करती है जैसे कि धर्मविधि के दौरान दीक्षार्थियों में पवित्र तेल मलन के पूर्व  संतों की स्तुति बिन्ती की जाती है। ये सारी चीजें प्राचीन काल से चली आ रहीं वे सारी निशानियाँ हैं जो बपतिस्मा के द्वारा येसु ख्रीस्त में नये जीवन की शुरूआत करने वालों को यह आश्वासन देती है कि कलीसिया उनके लिये सदैव प्रार्थना करती है जिससे वे बुराइयों से बचे रहें। कलीसिया उनके साथ रहती और उन्हें पापों के जंजाल से दूर रखते हुए ईश्वरीय कृपा के राज्य में सहभागी होने हेतु मदद करती है। यही कारण है कि पुरोहित व्यस्क दीक्षार्थियों के दीक्षांत के दौरान उन्हें शैतान के प्रंपचों का परित्याग करने का घोषणा कराता है जिसमें उन सभी बातों का परित्याग करने की घोषणा की जाती है जो उन्हें येसु ख्रीस्त से अलग करते और उनके साथ संयुक्त होने में बाधक बनते हैं। इसके साथ ईश्वर से यह भी निवेदन किया जाता है कि वे अपने बच्चों को आदि पाप के बंधन से मुक्त करें और उन्हें पवित्र आत्मा का निवास स्थल बनायें। संत पापा ने कहा कि जिस तरह सुसमाचार हमें साक्ष्य देता है कि येसु ख्रीस्त ने स्वयं शैतान से युद्ध किया और उस पर विजय प्राप्त करते हुए ईश्वर के राज्य के आने की घोषणा की। (मत्ती. 12.28) शैतान पर येसु ख्रीस्त की विजय हमारे बीच ईश्वर के राज्य को स्थापित करता है जहाँ हम अपने में ईश्वर के संग मिलन की खुशी का अनुभव करते हैं।

“बपतिस्मा कोई जादुई मंत्र नहीं है”, संत पापा ने कहा, वरन यह हमारे लिए पवित्र आत्मा का उपहार है जो उन लोगों को “बुरी आत्माओं से लड़ाने के योग्य बनता है” जो यह विश्वास करते हैं कि “पिता ने अपने पुत्र को दुनिया में भेजा जिससे वे शैतान की शक्ति का विनाश करें और मानव को मृत्यु के अंधकार से निकाल कर ज्योति के अनंत राज्य में ले चलें।” उन्होंने कहा कि हम अपने अनुभव के द्वारा इस बात को जानते हैं कि ख्रीस्तीय जीवन सदैव परीक्षाओं से घिरा हुआ है जो हमें ईश्वर की योजनाओं और उनके साथ हमारे संबंध को तोड़ते हुए हमें दुनिया की मोह-माया के जालों में फँसा देता है।

संत पापा फ्राँसिस ने कहा कि प्रार्थना के अलावे, “दीक्षार्थियों की छाती में दीक्षांत के तेल का विलेपन किया जाता है जिसके द्वारा वे पाप और शैतान का परित्याग करने की शक्ति प्राप्त करते हुए नये जीवन में प्रवेश करते हैं।” तेल का हमारे शरीर में प्रवेश करना हमारी कोशिकाओं के लिए लाभप्रद होता है, प्राचीन समय में कुश्ती लड़ने वाले अपने शरीर की मांसपेशियों को मजबूत करने और आसानी से अपने विपक्षी की पकड़ में आने से बचने हेतु तेल का विलेपन करते थे। इस निशानी के परिपेक्ष में प्रथम सदी के ख्रीस्तियों ने दीक्षार्थियों के शरीर में बपतिस्मा के दौरान तेल मलन की धर्मविधि को अपनाया जो हमारे लिए मुक्ति की बात को निरुपित करती है।

संत पापा ने कहा,“बुराई से बचना, धोखा घड़ियों से दूर रहना, एक थकान भरे युद्ध के उपरांत अपनी शक्ति को पुनः प्राप्त करना हमारे लिए कठिन लगता है इसके बावजूद हमें यह जानना चाहिए कि हम ख्रीस्तियों का सम्पूर्ण जीवन एक युद्ध है। लेकिन हमें इस बात से भी वाकिफ होने की जरुरत है कि हम अकेले नहीं हैं बल्कि माता कलीसिया हमारे साथ है जो सदैव हमारे लिए प्रार्थना करती है जिससे हम बपतिस्मा द्वारा मिलने वाली कृपाओं में मजबूत बनते हुए शैतान के जंजालों से बचे रहें। यह इसलिए कि हमारे मुक्तिदाता येसु ख्रीस्त मृतकों में से जी उठे हैं। पुनर्जीवित प्रभु येसु की शक्ति से हम शैतान पर विजयी प्राप्त करते हैं (यो.12.31) संत पापा ने कहा कि हम संत पौलुस के शब्दों को अपने में दोहरा सकते हैं, “जो मुझे बल प्रदान करते हैं मैं उनकी सहायता से सब कुछ कर सकता हूँ। (फिलि. 4.13)

इतना कहने के बाद संत पापा फ्राँसिस ने अपनी धर्मशिक्षा माला समाप्त की और सभी तीर्थयात्रियों और विश्वासी समुदाय का अभिवादन किया।

उन्होंने विशेष रुप से युवाओं, बुजुर्गों, बीमारों और नव विवाहितों की याद की। उन्होंने कहा कि आज हम सुसमाचार लेखक संत मारकुस का त्योहार मनाते हैं। हम उनकी मध्यस्था द्वारा विनय करें जिससे हमें अपने विश्वास के मार्ग में अडिग बने रहें और अपने जीवन के द्वारा येसु ख्रीस्त के सुसमाचार का साक्ष्य दे सकें।

इतना कहने के बाद संत पापा ने सभी विश्वासियों और तीर्थयात्रियों के साथ हे हमारे पिता प्रार्थना का पाठ किया और सबों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।

 


(Dilip Sanjay Ekka)

25/04/2018 17:14