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झारखंड की नई कोटा नीति में संदिग्ध राजनीति

प्रतीकात्मक तस्वीर

14/04/2018 14:44

झारखंड, शनिवार, 14 अप्रैल 2018 (ऊकान)˸ भारत की झारखंड सरकार द्वारा आदिवासी और दलित लोगों के लिए नौकरी के कोटा को कमजोर करने की एक योजना को राजनीतिक रूप देने का प्रयास की जा रही है।

हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक पैनल ने कुछ जिलों में निम्न श्रेणी की सरकारी नौकरियों की उपलब्धता का विस्तार करने का प्रस्ताव रखा है।

ऐसी नौकरी लोगों को 10 साल की अवधि के लिए दी जाएगी, भले ही उनके पास आदिवासी या निम्न जाति की पृष्ठभूमि न हो।

हजारीबाग धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष माननीय आनन्द जोजो ने 10 अप्रैल को ऊका समाचार से कहा कि यह अन्य मतदाताओं को जीतते हुए, आदिवासियों और दलित समुदायों की उन्नति को रोकने का एक "सामरिक" कदम है।

सरकारी पैनल के सदस्य राज सिन्हा ने ऊका समाचार को बतलाया कि राज्य के अनेक लोग, आदिवासियों और दलितों के समान अथवा उनसे भी खराब स्थिति में जीते हैं, जिन्हें पूर्व में अछूतों के रूप में जाना जाता था।

झारखंड राज्य का निर्माण 18 साल पहले किया गया था जिसका मुख्य मकसद था  आदिवासियों को आगे बढ़ाना। कई नौकरियां उनके लिए और साथ ही दलितों के लिए आरक्षित थीं।

सरकार ने 2016 में राज्य के 24 जिलों में से 13 में आदिवासी समुदायों और दलितों के लिए सभी निम्न श्रेणी की नौकरियां आरक्षित कीं, जहां वे बहुमत का गठन करते हैं। आरक्षित नौकरियों में पुलिस कांस्टेबल, टाइपिस्ट, टेलिफोन ऑपरेटर और सड़क सफाई कर्मचारी शामिल हैं।

हालांकि ये प्रावधान पैनल के मसौदे की सिफारिशों के तहत बने रहने के लिए हैं, 11 अन्य जिलों में निचली श्रेणी की नौकरियां स्थानीय निवासियों के लिए पूरी तरह से आरक्षित रहेंगी।

सिन्हा ने कहा कि इन नौकरियों में अन्य जिलों के लोगों को स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि 17 अप्रैल को मुख्यमंत्री रघुबर दास को सिफारिशों का एक अंतिम सेट पेश किया जाएगा।

राज्य की कुल जनसंख्या 33 मिलियन है जिसमें से 26 प्रतिशत या 9 मिलियन आदिवासी हैं जबकि दलितों की संख्या लगभग 11 प्रतिशत है तथा अन्य निचली जातियों की कुल आबादी 40 प्रतिशत है।

जमशेदपुर के धर्माध्यक्ष माननीय फेलिक्स टोप्पो ने कहा कि नौकरी में आरक्षण का इस्तेमाल, स्थानीय गरीब गैर-आदिवासियों एवं गैर-दलितों की वास्तिवक सहायता की अपेक्षा "राजनीतिक खेल योजना" के रूप में किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि भाजपा आदिवासी ईसाई समुदायों और अन्य धर्मों के सदस्यों को विभाजित कर, खुद को हिंदूओं के लिए चैंपियन के रूप में प्रस्तुत करने में असफल रही है।

कलीसिया और आदिवासी समुदायों ने सफलता पूर्वक राज्य सरकार का विरोध किया है जो उनके भूमि के अधिकारों को कमजोर करने का प्रयास कर रही थी।

राज्य में 1.5 मिलियन ईसाई हैं, उनमें से आधी संख्या काथलिकों की है

लगभग सभी ईसाई आदिवासी या दलित पृष्ठभूमि से आते हैं और ख्रीस्तीय  मिशनरियों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा के कारण प्रतियोगिता की परीक्षाओं में सफल होते हैं।

ख्रीस्तीयों पर अक्सर आदिवासियों एवं दलितों के बीच प्रलोभन या अनुचित दबाव का प्रयोग कर धर्मांतरण द्वारा राज्य कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया जाता है।  


(Usha Tirkey)

14/04/2018 14:44