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भारत की काथलिक कलीसिया इच्छामृत्यु को अस्वीकार करती है

प्रतीकात्मक तस्वीर - AFP

10/03/2018 14:42

नई दिल्ली, शनिवार, 10 मार्च 2018 (एशियान्यूज़)˸ काथलिक कलीसिया सक्रिय इच्छामृत्यु के साथ-साथ निष्क्रिय इच्छामृत्यु के बारे में किसी भी प्रस्ताव को खारिज करती है। भारत के काथलिक धर्माध्यक्षों द्वारा यह टिप्पणी देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उस फैसले के बाद जारी की गयी जो गंभीर बीमारियों के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देता है।

टिप्पणी पर काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के न्याय, शांति एवं विकास विभाग के राष्ट्रीय सचिव फादर स्तेफन फेर्नांडिस का हस्ताक्षर है।

टिप्पणी में कहा गया है कि कोई भी, किसी भी तरह से एक निर्दोष इंसान की हत्या, एक भ्रूण, एक शिशु या एक वयस्क, एक बूढ़ा व्यक्ति अथवा एक असाध्य रोग से पीड़ित, या एक व्यक्ति जो मर रहा है, की अनुमति नहीं दे सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक हालांकि अत्यन्त विवादास्पद कानून जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि हर इंसान को "गरिमा के साथ मरने" का मौलिक अधिकार है। अपने फैसले में, पांच न्यायाधीशों ने इच्छामृत्यु के लिए शर्तें निर्धारित की हैं कि इसके लिए रोगी को "जीवित वसीयतनामा" बनाना चाहिए जो अपरिवर्तनीय कोमा के मामले में चिकित्सा सहायता को अस्वीकार करने के बारे में स्पष्ट निर्देश दे। यह चिकित्सा देखभाल को रोकने के लिए अनुमति देगा।̎

अदालत इच्छामृत्यु का अर्थ भी स्पष्ट करता है कि यह एक असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति की मौत की रफ्तार बढ़ाने के इरादे से सोच-विचार के साथ चिकित्सा पर रोक लगाना है।

काथलिक कलीसिया के लिए,  ̎̎ किसी के पास स्वयं के लिए अथवा हमारी देखभाल करने वालों के लिए हत्या के इस अधिनियम के बारे में पूछने का अधिकार नहीं है।"

"भारत में, जीवन की पवित्रता को अब तक सर्वोच्च स्थान पर रखी गई है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में उसके दायरे में मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं है। निर्दोष जीवन को समाप्त करना कभी भी एक नैतिक कार्य नहीं हो सकता।"

सीबीसीआई के अनुसार इच्छामुत्यु को वैध बनाना, कमजोर लोगों के जीवन को खतरे में डालेगा, जिनके बारे में दूसरे यह सोचने के लिए प्रेरित हो सकते हैं कि उनका मर जाना ही बेहतर होगा।

धर्माध्यक्षों ने इस बात पर भी गौर किया है कि खासकर, जीवन के अंतिम समय में जब यह स्पष्ट हो जाए कि मृत्यु को टाला नहीं जा सकता, तब उपचार से इंकार किया जा सकता है ताकि जीवन की एक अनिश्चित और बोझ बनने वाले लंबे समय से छुटकारा मिल सके किन्तु ऐसे मामलों में बीमार व्यक्ति की सामान्य देखभाल बाधित न हो।  

काथलिक कलीसिया की धर्मशिक्षा (न. 2278) के अनुसार ̎ उन चिकित्सा प्रक्रियाओं को रोकना जो बोझ, खतरनाक, असाधारण अथवा असंगत हो, अपेक्षित परिणाम के लिए वैध हो सकता है, यह 'अत्याधिक उत्साही' उपचार का इनकार है।̎

शांति प्रदान करने वाला उच्च स्तरीय देखभाल, देखभाल करने वालों के प्रति अधिक समर्थन तथा जीवन के अंत तक सेवा देने को बढ़ावा देना ही सच्चे सहानुभूतिपूर्ण समाज की कसौटी हो सकती है। एक आदर्श समाज का चिन्ह है सबसे कमजोर लोगों की देखभाल कर पाने की क्षमता एवं तत्परता।  


(Usha Tirkey)

10/03/2018 14:42