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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 94 भाग-3

मकदूनिया स्थित स्कोपिये के महागिरजाघर में बाईबिल और मोमबत्ती हात में लिये एक महिला, 07.01.2018 - REUTERS

04/03/2018 10:52

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"निर्बुद्धियों सावधान रहो। मूर्खों! तुम कब समझोगो? जिसने कान बनाया, क्या वह नहीं सुनता? जिसने आँख बनायी, क्या वह नहीं देखता? जो राष्ट्रों का शासन करता है, क्या वह दण्ड नहीं देता? जो मनुष्यों को शिक्षा देता है, क्या वह नहीं जानता? प्रभु मनुष्यों के विचार जानता है; वह जानता है कि वे व्यर्थ हैं।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 94 वें भजन के आठ से लेकर 11 तक के पद। विगत सप्ताह पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने इन्हीं पदों की व्याख्या की थी। प्रभु ईश्वर की न्याय प्रियता का बखान कर इस भजन में प्रार्थना की गई है कि प्रभु दुर्जनों और दुष्टों को दण्डित कर अपना न्याय प्रकट करें। भजनकार दुष्ट लोगों को मूर्ख एवं निर्बुद्धि कहकर पुकारता है तथा उनका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित कराता है कि प्रभु ईश्वर जिसने मनुष्य की सृष्टि की, बोलने के लिये उसे जिव्हा, सुनने के लिये कान और देखने के लिये आँख दी, क्या वे सबकुछ नहीं सुन सकते? सब कुछ नहीं देखते?  वे इस भ्रम में न पड़े कि प्रभु ईश्वर उनके कुकर्मों से वाकिफ़ नहीं हैं क्योंकि प्रभु सबकुछ को देखते तथा प्रत्येक के विचार जानते हैं। वस्तुतः भजन के उक्त पदों में हम ईश्वर के प्रत्युत्तर को पाते हैं। दुष्ट कर्मों में लगे लोगों को याद दिलाया गया है कि प्रभु ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वव्यापी एवं अन्तरयामी हैं।

श्रोताओ, विगत प्रसारण में आपका ध्यान इस ओर आकर्षित कराया था कि सुसमाचारों में भी हम इस प्रकार के शब्द पाते हैं। पुनरुत्थान में विश्वास न करने वालों से येसु ख्रीस्त कहते हैं, "निर्बुद्धियो! नबियों ने जो कुछ कहा है, तुम उस पर विश्वास करने में कितने मन्दगति हो। क्या यह आवश्यक नहीं था कि मसीह वह सब सहें और इस प्रकार अपनी महिमा में प्रवेश करें?"  कहने का सार यह कि जो लोग ईश्वर के कार्यों पर विश्वास नहीं करते अथवा उनके कार्यों को देखने असमर्थ रहते हैं उनमें ज्ञान का अभाव है। इसी प्रकार जो लोग यह सोचकर कि ईश्वर हमारे कार्यों को देखने और सुनने में असमर्थ हैं, बुराई में लगे रहते हैं तथा समाज के कमज़ोर वर्ग पर अत्याचार किये चले जाते हैं, वे भी निर्बुद्धि अथवा मन्द बुद्धि वाले एवं मूर्ख हैं।

श्रोताओ, हम विश्वास करते हैं कि ईश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की और उसकी देख-रेख के लिये मनुष्यों का सृजन किया। वे सम्पूर्ण धरती के राष्ट्रों पर शासन करते हैं, वे मनुष्यों को शिक्षा देते हैं कि वे अपना जीवन किस तरह यापन करें, वे किस तरह अपना पालन पोषण करें, किस तरह अपनी जीविका कमायें तथा प्रभु के आदेशों पर चलते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहें।

आगे, 94 वें भजन के 12 से लेकर 15 तक के पदों में भजनकार कहता है, "प्रभु! धन्य है वह मनुष्य, जिसे तू सुधारता और अपनी संहिता की शिक्षा देता है!  वह संकट के समय नहीं घबराता, जब कि दुर्जन के लिये गड्ढा खोदा जा रहा है। प्रभु अपनी प्रजा का परित्याग नहीं करता; वह अपनी विरासत को नहीं त्यागता। धर्मी को न्याय दिलाया जायेगा और सभी निष्कपट लोग उसका समर्थन करेंगे।"

12 वाँ पद दुष्ट अथवा कुकर्मों में संलग्न लोगों के लिये नहीं हैं अपितु ईश प्रजा के लिये कहे शब्द हैं। उन लोगों को धन्य कहा गया है जिन्होंने ईश्वर के आदेशों को समझ लिया है तथा उनका अपने जीवन पर अमल करते हुए अनाथों, विधवाओं एवं परदेशियों की मदद का बीड़ा उठाते हैं, ऐसे ही लोग धन्य हैं, ऐसे ही लोग प्रभु ईश्वर के कृपा पात्र होंगे। श्रोताओ, इस पद में भजनकार हम सबसे अपील करता है। उसका कहना है कि यदि हम स्वतः को ईश सन्तान स्वीकार करते हैं, स्वतः को ईश प्रजा के सदस्य मानते हैं और यह स्वीकार करते हैं कि प्रभु ईश्वर ने अपने प्रेम के ख़ातिर हमारी सृष्टि की तो हमें सब मनुष्यों की सम्मान करना चाहिये, चाहे वे किसी भी वर्ण, नस्ल, जाति अथवा रंग के ही क्यों हों। ईश्वर संहिता में हमारे सहभागी हैं जो प्रेम में हमारे साथ बरकरार रहते हैं, ईश्वर हमारी पीड़ा का अनुभव करते हैं। इसीलिये जो लोग आँखें होते हुए भी नहीं देख पाते और कान होते हुए भी सुन पाते उन्हें मूर्ख कहा गया है।  

श्रोताओ, प्रभु ईश्वर का प्रेम और उनकी दया अपार है और अपनी दया के कारण ही वे हममें विवेक उत्पन्न करते हैं, इसीलिये भजनाकर कहता है, “प्रभु अपनी प्रजा का परित्याग नहीं करता; वह अपनी विरासत को नहीं त्यागता।“ ईश्वर हमें विवेकहीन नहीं छोड़ते, वे धर्मी को न्याय दिलाकर ही रहते हैं। अस्तु, मनुष्य वह ही करे जो प्रभु ईश्वर की इच्छा के अनुकूल है। मीकाह के ग्रन्थ के छठवें अध्याय के आठवें पद में नबीं मनुष्य के दायित्वों को परिभाषित करता है, लिखा है, "मनुष्य! तुमको बताया गया है कि उचित क्या है। यह इतना ही है – न्यायपूर्ण व्यवहार, कोमल भक्ति और ईश्वर के सामने विनयपूर्ण आचरण।"  

श्रोताओ, "धर्मी को न्याय दिलाया जायेगा", इन शब्दों पर चिन्तन करते हुए बाईबिल व्याख्याकार बोनहोफ्फर कहते हैं, कि प्राचीन व्यवस्थान में न्याय पर बल दिया गया है। वह भी ऐसा न्याय जो तत्काल प्रकट हो। वे ऐसा न्याय चाहते थे जो उसी क्षण उनके समक्ष दिखे मानों अनन्त जीवन का कोई महत्व ही नहीं। उनका कहना था कि ईश्वर का न्याय क्षणिक न होकर अनन्त है जो मनुष्य की चाहत के क्षण में नहीं अपितु उपयुक्त और उचित क्षण में प्रकट होता है। बोनहोफ्फर का कहना था कि जिस क्षण मनुष्य को न्याय मिलता है वह केवल उसी क्षण मात्र के लिये नहीं होता बल्कि उससे परे होता है, अनन्त काल के लिये होता है। इसी सन्दर्भ में प्रभु येसु मसीह ने अन्तिम न्याय का दृष्टान्त सुनाया था जिसे हम सत्ती रचित सुसमाचार के 25 वें अध्याय के 31 से लेकर 46 तक के पदों में पाते हैं। प्रभु येसु स्पष्ट रूप से कहते हैं, "धर्मी अनन्त जीवन में प्रवेश करेंगे"।


(Juliet Genevive Christopher)

04/03/2018 10:52