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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 93-94

चीले में एक सिरियाई परिवार से बाईबिल की प्रति ग्रहण करते सन्त पापा फ्राँसिस, 16.01.2018 - EPA

20/02/2018 10:42

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"आकाश के ऊपर विराजमान प्रभु बाढ़ के गर्जन और महासागर की प्रचण्ड लहरों से कहीं अधिक शक्तिशाली है। प्रभु! तेरे आदेश अपरिवर्तनीय है। तेरे मन्दिर की पवित्रता अनन्त काल तक बनी रहेगी।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 93 वें भजन के अन्तिम पद। विगत सप्ताह इन्हीं पदों की व्याख्या से हमने पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम समाप्त किया था। स्तोत्र ग्रन्थ का 93 वाँ भजन पाँच पदों वाला लघु भजन है जिसमें ईश्वर को विश्व का अधिपति स्वीकार कर उनकी महिमा का बखान किया गया है। भजनकार प्रभु ईश्वर को प्रताप का वस्त्र ओढ़े और सामर्थ्य का कटिबन्ध बाँधे राजाओं में देखता है जिनका राज्य केवल किसी सीमित अवधि के लिये नहीं है अपितु अनन्त काल तक बना रहेगा। इस भजन में इस्राएल के लोगों को स्मरण दिलाया गया है कि उनके वास्तविक राजा ईश्वर हैं और कोई नहीं। भजनकार कहता है कि प्रभु राजा हैं, वे अनादि से राजा हैं और अनन्त काल तक राजा रहेंगे। बाढ़ की प्रचण्ड लहरों ने विश्व का विनाश करना चाहा किन्तु प्रभु ईश्वर का प्रताप और उनका सामर्थ्य इन प्रचण्ड लहरों से कहीं अधिक शक्तिशाली है। अतीत में प्रभु ईश्वर ने स्वतः को राजा रूप में तब प्रकट किया जब उन्होंने सृष्टि की रचना की और विश्व को स्थापित किया, उन्हीं की स्तुति होती रहे और उन्हीं के आदर में नये गीत गाये जाते रहें।

अब आइये स्तोत्र ग्रन्थ के 94 वें भजन पर दृष्टिपात करें। 24 पदों वाले इस भजन में प्रभु ईश्वर की न्याय प्रियता का बखान किया गया है। इस भजन में प्रार्थना की गई है कि प्रभु दुर्जनों और दुष्टों को दण्डित कर अपने न्याय को प्रकट करें। इसके प्रथम सात पद इस प्रकार हैं, "प्रभु! प्रतिशोधी ईश्वर, अपने को प्रकट कर। पृथ्वी के न्यायकर्त्ता! उठ कर घमण्डियों से उनके कर्मों का बदला चुका। प्रभु दुर्जन कब तक, दुर्जन कब तक आनन्द मनायेंगे? वे धृष्टतापूर्ण बातें करते हैं। वे सब कुकर्मी डींग मारते हैं। प्रभु! वे तेरी प्रजा को पीसते और तेरी विरासत पर अत्याचार करते हैं। वे विधवाओं तथा परदेशियों की हत्या और अनाथों का वध करते हैं। वे कहते हैं: "प्रभु नहीं देखता, याकूब का ईश्वर उस पर ध्यान नहीं देता।"  

श्रोताओ, इस भजन के पहले पद का "प्रतिशोधी" शब्द विवादास्पद है इसलिये कि प्रभु ईश्वर प्रतिशोध नहीं लेते, ईश्वर प्रतिशोधी नहीं हो सकते, वे कभी बदला लेने की सलाह नहीं देते। यह तो भजनकार के मस्तिष्क की उपज है जो दुर्जनों से तंग आकर चाहता है कि प्रभु उनके अत्याचारों के लिये उनसे बदला लें तथा उन्हें दण्डित करें। प्रभु ईश्वर दयालु पिता है, वे प्रेमी पिता हैं वे न तो प्रतिशोध लेते और न ही दण्ड देना चाहते हैं। प्रभु का न्याय निष्पक्ष है। वे प्रत्येक का न्याय उसके कर्मों के अनुसार करते हैं। दुर्भाग्यवश, भजनकार इतना तंग आ चुका था कि वह चाहता था कि प्रभु ईश्वर अपना कोप प्रकट करें किन्तु ईश्वर क्रुद्ध नहीं होते बल्कि सत्य और न्याय की ओर हमारा ध्यान आकर्षित कराते हैं।

94 वें भजन का रचयिता ईश्वर के समक्ष दुष्टों के दुर्व्यवहार का विवरण प्रस्तुत करता है। वह कहता है घमण्डियों एवं दुर्जनों को उनके दुष्कर्मों के लिये दण्डित किया जाना चाहिये क्योंकि धृष्टतापूर्ण बातें करते हैं। वे सब कुकर्मी डींग मारते हैं और सबसे बदत्तर वे प्रभु की प्रजा यानि कि ईश्वर में विश्वास करनेवालों को पीसते हैं, उनपर अत्याचार करते हैं। वह इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित कराता है कि ईश्वर में भरोसा रखनेवाले सभी लोग ईश्वर की विरासत हैं और ईश्वर की विरासत पर हमला करनेवालों को दण्ड मिलना ही चाहिये। उन्हें इसलिये दण्ड मिलना चाहिये क्योंकि वे समाज के सर्वाधिक दुर्बल लोगों जैसे कि विधवाओं और परदेशियों पर आक्रमण करते तथा  अनाथों का वध करते हैं। उन मासूम बच्चों को मार डालते हैं जिनका कोई आसरा नहीं होता। एक प्रकार से भजनकार यहाँ शिकायत करता है कि घमण्डी, दुष्ट और दुर्जन अपने दुष्कर्मों में लगे रहते हैं और ईश्वर उन्हें दण्डित करने के लिये कुछ नहीं करते।

श्रोताओ, वर्तमान विश्व के परिप्रेक्ष्य में यदि 94 वें भजन के इन पदों को समझने की कोशिश करें तो आज भी यही हो रहा है। प्रायः सुनने में आता है कि सत्ताधारी अपने अधीन रहनेवालों को प्रताड़ित करते हैं। जिस मनुष्य के पास सत्ता और धन नहीं है, जिसकी भूमिका समाज में प्रभावशाली नहीं होती, जिसके पास अधिकारियों को भ्रष्ट करने के लिये धन नहीं होता, उसकी कहीं भी सुनवाई नहीं होती जबकि दुष्ट अपने सभी कार्यों को अन्जाम देते चले जाते हैं। आज की इस दुनिया में हमारे समक्ष वे लोग हैं जो निर्धनों को उधार देने के बहाने उनसे ब्याज पर ब्याज लिये जाते हैं जब तक कि उनसे उनका सर्वस्व नहीं छीन लेते। इटली, यूरोप और अमरीका में अपराध जगत के माफिया, जापान में अपराधी गुट याकूसा या फिर एशियाई देशों में ठग अथवा किराये के गुण्डे क्या करते हैं? वे वही करते हैं जिसकी चर्चा 94 वें भजन के रचयिता ने की है। भजन के छठवें पद में भजनकार विधवाओं एवं अनाथ बच्चों की व्यथा के प्रति ध्यान आकर्षित कराता है, कहता है, "वे विधवाओं तथा परदेशियों की हत्या और अनाथों का वध करते हैं।"

विधवाएँ एवं बच्चे समाज के दुर्बल सदस्य हैं जिनकी सहायता और सुरक्षा सुनिश्चित्त करना हम सबका दायित्व हैं किन्तु दुष्ट लोग विधवाओं और अनाथों को भी नहीं छोड़ते और उनपर दया करने के बजाय उनके विरुद्ध दुराचार में लगे रहते हैं। भजनकार परदेशियों की व्यथा पर भी हमारा ध्यान आकर्षित कराता है। आज विश्व में युद्धों के कारण अथवा आर्थिक अभावों के कारण कितने लोग अपने घरों का पलायन करने तथा परदेश में जीवन यापन करने के लिये बाध्य हैं किन्तु क्या इन परदेशियों को प्रतिष्ठापूर्ण जीवन का अवसर मिलता है? सातवें पद में भजनकार कहता है कि वे यानि कि दुर्जन कहते हैं: "प्रभु नहीं देखता, याकूब का ईश्वर उस पर ध्यान नहीं देता" और इसीलिये वे दुष्कर्मों में लगे रहते हैं। कहता है कि दुष्ट लोग इस भ्रम में पड़े रहते हैं कि याकूब के ईश्वर अपनी प्रजा पर ध्यान नहीं देते इसलिये वे उनपर अत्याचार कर सकते हैं। इसीलिये प्रभु ईश्वर से आर्त निवेदन कर, कहता है कि प्रभु, उठें और अपना न्याय प्रकट करें।


(Juliet Genevive Christopher)

20/02/2018 10:42