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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 92

जॉर्डन के बेथनी में एक पर्व दौरान बाईबिल की प्रति लिये एक ख्रीस्तीय पुरोहित, 12.01.2018 - AFP

06/02/2018 10:23

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"प्रभु का गुणगान करना कितना अच्छा है। सर्वोच्च ईश्वर, तेरे नाम का भजन गाना, तम्बूरा और वीणा बजाते हुए, सितार के मधुर संगीत के साथ, प्रातः तेरे प्रेम का और रात को तेरी सत्यप्रतिज्ञता का बखान करना कितना अच्छा है!"  

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 92 वें भजन के प्रथम चार पद विगत सप्ताह इन्हीं पदों की व्याख्या से हमने पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम समाप्त किया था। स्तोत्र ग्रन्थ के 92 वें भजन में धर्मियों के सौभाग्य एवं विधर्मियों तथा दुष्टों की अन्तगति की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया है। इस तथ्य पर हम ग़ौर कर चुके हैं कि प्राचीन व्यवस्थान के युग में यह भजन यहूदियों के विश्राम दिवस पर गाया जाता था। विश्राम दिवस के दिन सभी श्रद्धालु सर्वशक्तिमान् ईश्वर की स्तुति हेतु मन्दिर में एकत्र होते तथा उनका गुणगान करते हैं। यह दिवस प्रभु ईश्वर के अनुपम कार्यों पर मनन-चिन्तन करने, उनके प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने तथा प्रभु ईश्वर द्वारा सृजित सृष्टि की स्मृति का पावन दिवस है। इस भजन में हम मनुष्यों का भी आह्वान किया जाता है कि हम सर्वप्रथम तो ईश्वर के कार्यों को पहचानें, उन्हें स्वीकार करें तथा उनके लिये ईश्वर के प्रति धन्यवाद अर्पित करें।

भजन के आगे के पदों में भजनकार कहता है, "प्रभु तेरे कार्य मुझे आनन्दित करते हैं। तेरी सृष्टि देखकर मैं उल्लसित होकर कहता हूँ: "प्रभु तेरे कार्य कितने महान हैं। तेरी योजनाएँ कितनी गूढ़ हैं। अविवेकी मनुष्य यह नहीं जानता, मूर्ख यह नहीं समझता। विधर्मी भले ही घास की तरह बढ़ते हों, सब दुष्ट भले ही फलते-फूलते हों किन्तु वे सदा-सर्वदा के लिये नष्ट किये जायेंगे। जबकि तू, प्रभु सदा-सर्वदा स्वर्ग में विराजमान रहता है।"

श्रोताओ, दुष्ट और विधर्मी प्रभु के कार्यों को देखने अथवा पहचानने में असमर्थ होते हैं क्योंकि उनकी आँखों पर स्वार्थ, अहंकार और घमण्ड का पर्दा चढ़ा होता है और इसीलिये वे अपने ओर-छोर ईश्वर के कार्यों को देखने में असमर्थ रहते हैं जबकि विनीत मनुष्य प्रभु के कार्यों को देखते, उनपर आश्चर्य चकित होते तथा उनके लिये प्रभु ईश्वर का गुणगान करते हैं। सृष्टि को देखकर उनका यह विश्वास प्रबल होता चला जाता है कि हमारे ईश्वर सर्वशक्तिमान ईश्वर हैं जो सदा-सर्वदा स्वर्ग में विराजमान रहते हैं, जिनकी युगयुगान्तर तक स्तुति होती रहे, जिनके प्रति हर पल धन्यवाद ज्ञापित किया जाता रहे।

आगे 92 वें भजन के 10 से लेकर 13 तक के पदों में भजनकार कहता है, "तूने मुझे जंगली भैंसे जैसा बल प्रदान किया है। मैं उत्तम तेल से नहाता हूँ। मेरी आँख ने शत्रुओं की पराजय देखी है, मेरे कान ने अपने दुष्ट बैरियों के विषय में सुना है। धर्मी खजूर की तरह फलता-फूलता है और लेबानान के देवदार की तरह बढ़ता है।"

श्रोताओ, अपने विश्वास के बल पर भजनकार कहता है कि प्रभु ने उसे जंगली भैंसे जैसा बल प्रदान किया है। अपने विश्वास भरे अनुभव के कारण वह ऐसा कह सका। वह आनन्द के भाव से परिपूरित होकर यह महसूस करता है कि ईश्वर का आत्मा उसमें क्रियाशील है और यह इसलिये कि उसके विश्वास के कारण ईश्वर ने उसे चुना और उसे उत्तम तेल से अभिमंत्रित किया। ईश्वर का कृपा पात्र बनने के कारण उसने ख़ुद अपनी आँखों से शत्रुओं की पराजय देखी है और उसके कानों ने दुष्टों के विषय में सुना है। आगे कहता है, "धर्मी खजूर की तरह फलता-फूलता है और लेबानान के देवदार की तरह बढ़ता है।"

यहाँ मध्यपूर्व के देशों के दो प्रमुख वृक्षों का विवरण हैः खजूर और लेबनान के देवदार। श्रोताओ, खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा उठता है और सीधा खड़ा रहता है। यह एक बहुत ही उपयोगी वृक्ष है जो मनुष्य को भोजन प्रदान करता है। साथ ही यह रस्सियाँ, चटाई और छत बनाने के लिए आवश्यक सामग्री भी प्रदान करता है। इसकी प्रतिभा यह है कि यह बवंडर के समक्ष भी झुक सकता है और सबसे भीषण तूफान के आगे भी खड़ा रह सकता है। दूसरा वृक्ष है लेबनान का देवदार जो सभी वृक्षों में सबसे शानदार और लगभग 120 फुट लम्बा वृक्ष होता है। लेबनान में इस समय ऐसे देवदार हैं जो 2000 वर्ष तक पुराने वृक्ष हैं। फिर, राजा सुलेमान के युग में देवदार के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष ही मन्दिर की आन्तरिक दीवार का काम करते थे। अस्तु, भजनकार कहता है कि धर्मी पुरुष इन्हीं वृक्षों के सदृश हैं, जो तूफानों के आगे भी अचल रहते हैं।

इस स्थल पर मुझे ईशशास्त्री कार्ल बार्थ की एक बात याद आ जाती है जिन्होंने अस्सी की उम्र पार कर लेने पर अपने एक साथ ईशशास्त्री को लिखा था, "एक बूढ़े वृक्ष के सदृश हो जाने के बावजूद प्रसन्नचित्त रहकर आनन्द का अनुभव करना वास्तव में चमत्कारिक अनुभूति है।" वस्तुतः, ईशशास्त्री बार्थ कुरिन्थियों को प्रेषित सन्त पौल के दूसरे पत्र का सन्दर्भ दे रहे थे। इस पत्र के नवें अध्याय के सातवें पद में हम पढ़ते हैं, "हर एक ने अपने मन में जितना निश्चित्त किया है, उतना ही दे। वह अपनी अनिच्छा से अथवा लाचारी से ऐसा न करे, क्योंकि "ईश्वर प्रसन्नता से देनेवाले को प्यार करता है।"

श्रोताओ, ईशशस्त्री बार्थ जानते थे कि वृद्धावस्था के बावजूद वे आनन्दपूर्वक एवं स्वेच्छा से ईश्वर के अद्भुत कार्यों के विषय में अपने उत्कृष्ट लेखों द्वारा विश्व को अवगत करा सकते थे। एक अन्य बात ध्यान देने योग्य यह कि जिस प्रकार खजूर के पेड़ और देवदार के वृक्ष अपने आस-पास बहुत से छोटे पौधों को सुरक्षा प्रदान करते हैं और अपनी परिपक्वाता में भी, अपनी वृद्धावस्था के बावजूद फलदायी होते तथा कृपा एवं प्रेम की सजीवता प्रकट करते हैं उसी प्रकार, 92 वें भजन का रचयिता आग्रह करता है कि, हम भी ईश्वर के महान कार्यों के लिये उनका स्तुतिगान करें। 


(Juliet Genevive Christopher)

06/02/2018 10:23