Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

महत्त्वपूर्ण लेख \ पत्र

पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 91(भाग-2)

बेथनी में यर्दन नदी के तट पर पवित्र बाईबिल की प्रति हाथ में लिये एक ख्रीस्तीय पुरोहित, 12.01.2018 - AFP

23/01/2018 10:13

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"तुम्हें न तो रात्रि के आतंक से भय होगा और न दिन में चलनेवाले बाण से; न अन्धकार में फैलनेवाली महामारी से और न दोपहर को चलनेवाली घातक लू से। तुम्हारी बग़ल में भले ही हज़ारों और तुम्हारी दाहिनी ओर लाखों ढेर हो जायें, किन्तु तुमको कुछ नहीं होगा। तुम अपनी आँखों से देखोगे, कि किस प्रकार विधर्मियों को दण्ड दिया जाता है, क्योंकि प्रभु तुम्हारा आश्रय है, तुमने सर्वोच्च ईश्वर को अपना शरणस्थान बनाया है।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 91 वें भजन के 05 से लेकर 09 तक के पद। 11 जनवरी को पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने इन्हीं पदों की व्याख्या से अपना प्रसारण समाप्त किया था। 91 वें भजन में उपदेशक भक्तों को स्मरण दिलाता है कि वे हर पल प्रभु ईश्वर की छत्रछाया में रहते हैं और प्रभु की छत्रछाया में रहने से श्रेष्ठकर और कुछ नहीं हो सकता। अस्तु, वे ईश्वर पर भरोसा रखना नहीं छोड़ें क्योंकि ईश्वर ही उनके आश्रय, ईश्वर ही उनके दुर्ग और उनका शरण स्थल हैं।

इन पदों में आतंक, महामारी, दोपहर को चलनेवाली लू आदि बुराई के आक्रमणों का काव्यात्मक विवरण यही दर्शाता है कि प्राचीन काल में भी आज ही तरह लोगों को बुराई की शक्तियों का भय लगा रहता था। इस बात की ओर हमने आपका ध्यान आकर्षित किया था कि संग्रहालयों में सुरक्षित कई तस्वीरें एवं प्रतिमाएँ डरावने मुख या पंखों वाले आसुरों को दर्शाती हैं। प्रभु ईश्वर को भी पँखों सहित दर्शाया जाता है किन्तु ईश्वर अपने भक्तों की रक्षा के लिये इन्हें फैलाते हैं। मन्दिर के उपदेशक के कहने का सार यह कि हमारा विश्व एक ख़तरनाक स्थल है जहाँ मनुष्य को कभी भी किसी भी क्षण बुराई का बाण लग सकता है किन्तु ईश्वर में भरोसा रखनेवाले को भय खाने की कोई आवश्यकता नहीं।    

श्रोताओ, डरना या भय खाना मानव की प्रकृति है तथा हमारी इस प्रकृति से प्रभु ईश्वर परिचित हैं। यदि धर्मग्रन्थों में निहित "स्वर्गदूत" शब्द पर हम ग़ौर करें तो हमें ज्ञात होता है कि जब अनन्त का भाव मानव मन में या उसके अन्तःकरण में प्रस्फुटित होता है तब सबसे पहले मनुष्य अपने मनो-मस्तिष्क और अपने हृदय से जिन शब्दों का श्रवण करता है वह है, "डरो मत"। वस्तुतः 91 वें भजन में उस नन्हें बालक का चित्र प्रस्तुत किया गया है जो पूरे भरोसे और विश्वास के साथ अपने पिता की ओर दृष्टि डालता है, यह जानते हुए कि पिता की छत्रछाया में वह सुरक्षित है।

आगे 91 वें भजन के 10 से लेकर 13 तक के पदों में ईशभक्त को स्वयं प्रभु से रक्षा का आश्वासन मिलता है। श्रोताओ, यह जानते हुए भी कि ईश्वर हमारी रक्षा करने में समर्थ हैं हम पूरी तरह से उनमें विश्वास व्यक्त नहीं करते। हमें सदा भय लगा रहता है कि कहीँ प्रभु हमसे नाराज़ न हो जाये और हम पर विपत्ति आ पड़े। जबकि ईश्वर तो प्रेमी पिता है जो अपनी सन्तानों की हर पल रक्षा करते हैं। भजनकार कहता है, "तुम्हारा कोई अनिष्ठ नहीं होगा, महामारी तुम्हारे घर के निकट नहीं आयेगी, क्योंकि वह अपने दूतों को आदेश देगा कि तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वे तुम्हारी रक्षा करें। वे तुम्हें अपने हाथों पर उठा लेंगे कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे। तुम सिंह और साँप को कुचलोगो, तुम बाघ और अजगर को पैरों तले रौंदोगे।" 

श्रोताओ, बाईबिल के कई पृष्ठों में हम विश्वासियों को मिले इस प्रकार आश्वासनों को पाते हैं। बाईबिल धर्मग्रन्थ के शब्द प्रभु में हमारे विश्वास को सुदृढ़ करते तथा आपत्तिकाल में हमें सान्तवना प्रदान कर हमारे भय को दूर भगाते हैं। वस्तुतः, 91 वें भजन के ये शब्द कि "वह अपने दूतों को आदेश देगा कि तुम जहाँ कहीं भी जाओगे, वे तुम्हारी रक्षा करें। वे तुम्हें अपने हाथों पर उठा लेंगे कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे", सन्त मत्ती रचित सुसमाचार में शैतान द्वारा उजाड़ प्रदेश में येसु की परीक्षा की घटना का स्मरण दिला देते हैं। सुसमाचार के चौथे अध्याय के पाँच से लेकर सात तक के पदों में हम पढ़ते हैं, "तब शैतान उन्हें पवित्र नगर के मन्दिर के शिखर पर ले गया और उनसे बोला, "यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं तो नीचे कूद जाइए, क्योंकि लिखा है- तुम्हारे विषय में वह अपने दूतों को आदेश देगा। वे तुम्हें अपने हाथों पर सम्भाल लेंगे कि कहीं तुम्हारे पैरों को पत्थर से चोट न लगे।" शैतान ने पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल के शब्दों का दुरुपयोग किया था, उसने 91 वें भजन के शब्दों को दुहराया था ताकि येसु की परीक्षा ले सके किन्तु अपने षड़यंत्र में वह असफल रहा। येसु को वह प्रलोभन में नहीं डाल पाया क्योंकि उन्होंने शैतान को यह कहकर फटकार बताई कि वह "अपने प्रभु ईश्वर की परीक्षा नहीं ले, कि वह हट जाये क्योंकि लिखा है, "अपने प्रभु ईश्वर की आराधना करो और केवल उसी की सेवा करो।" 

आगे 91 वें भजन के अन्तिम तीन पदों में ईश भक्त को प्रभु का आश्वासन मिलता है। ईश्वर की सत्यप्रतिज्ञता उसके समक्ष इन शब्दों में व्यक्त होती है। लिखा है, "वह मेरा भक्त है, इसलिये मैं उसका उद्धार करूँगा। वह मेरा नाम जानता है, इसलिये मैं उसकी रक्षा करूँगा। यदि वह मेरी दुहाई देगा, तो मैं उसकी सुनूँगा। मैं संकट में उसका साथ दूँगा। मैं उसका उद्धार कर उसे महिमान्वित करूँगा। मैं उसे दीर्घायु प्रदान करूँगा और उसे अपने मुक्ति विधान के दर्शन कराऊँगा।" इन शब्दों में ईशभक्त को प्रभु ईश्वर की आशीष मिलती है। ईशभक्त प्रभु की उपस्थिति से प्रफुल्लित हो जाता तथा उनकी छत्रछाया में सुरक्षा प्राप्त करता है। प्रभु संकट में उसे सम्बल प्रदान करते तथा उसका साथ देते हैं जिससे वह कभी स्वतः को अकेला महसूस नहीं करे। वही व्यक्ति ईश्वर का साथ एवं उनकी सुरक्षा पाता है जो उनमें विश्वास करता है। ऐसे ही ईश भक्त को प्रभु अपने मुक्ति विधान का दर्शन कराते हैं।


(Juliet Genevive Christopher)

23/01/2018 10:13