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संत पापा फ्राँसिस \ प्रेरितिक यात्रा

संत पापा धर्माध्यक्षों से : लोगों की भाषाओं में सुसमाचार प्रचार करें

पेरु के करीब 60 धर्माध्यक्ष भाईयों को संदेश देते हुए संत पापा फ्राँसिस - AFP

22/01/2018 16:16

लीमा, सोमवार 22 जनवरी,2018 (रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने महाधर्माध्यक्षीय आवास में पेरु के करीब 60 धर्माध्यक्ष भाईयों से मुलाकात की।  उन्होंने अपनी यात्रा के बारे में अपने भाईयों से कहा कि उनकी यात्रा का उद्देश्य ‘आशा एवं एकता’ था।

विभिन्न स्थानों और विश्वासियों से मुलाकात कर उन्हें लगा कि उनकी यह यात्रा "बहुत महत्वपूर्ण और संतुष्टिदायक" थी। "यह समय लेने वाली परंतु काफी रोमांचक कार्यक्रम है।"ये सभी बातें अनायास ही हमारा ध्यान लैटिन अमेरिका के धर्माध्यक्षों के संरक्षक संत तुरिबियस दी मोग्रोवेहो के साहसिक उपलब्धियों की ओर जाता है और जैसे कि संत पापा जॉन पॉल द्वितीय ने अपनी पहली प्रेरितिक यात्रा के दौरान उन्हें 'कलीसियाई एकता का निर्माता' कहा था।"

संत पापा ने कहा कि कलीसिया ने इस संत को "नए मूसा" के रूप में चित्रित किया है। वाटिकन में इनकी एक तस्वीर है जिसमें संत तुरिबियस  एक बड़ी नदी पार कर रहे हैं। लाल सागर के समान नदी का पानी दो भागों में बंट गया है बीच से संत तुबिरियस हैं और उनके पीछे एक समूह है जो धर्मप्रचार के काम में अपने चरवाहे का साथ देने वाले प्रचारकों का प्रतिनिधित्व करते हैं। नदी के उस पार लोगो की भीड़ में स्वंय येसु ख्रीस्त उनका इन्तजार कर रहे हैं।

संत पापा ने कहा कि जैसे ही संत तुरिबियस  को इस धरती के लोगों का चरवाहा और पिता का काम सौंपा गया उन्होंने अपनी सुरक्षा, आराम और परिचित परिवेश को छोड़ कर पूरी तरह से अज्ञात और चुनौतियों भरी नई दुनिया में प्रवेश किया।

      उनका धर्मप्रांत बहुत ही बड़ा और विस्तृत था। उन्होंने दूर दराज क्षेत्रों में विश्वासियों की तलाश में उनके पास संदेश पहुंचाने, उनके साथ रहने का प्रण किया। अपने 22 वर्षों के धर्माध्यक्षीय काल में 18 वर्ष अपने धर्मध्यक्षीय निवास शहर से बाहर बिताया। उसका सारा समय प्रेरितिक यात्रा में बीता। उन्होंने पूरे धर्मप्रांत की तीन बार प्रेरितिक यात्रा की। वे एक चरवाहे का उत्तरदायित्व भली भांति जानते थे। वे स्वयं  अपने लोगों के करीब गये। संस्कारों का अनुष्ठान किया और उसने लगातार अपने पुरोहितों को भी ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित किया। आज हम उन्हें  "सड़क" धर्माध्यक्ष कह सकते हैं। रास्ता तय करते करते उनके जूते फट जाते थे। उन्होंने बिना डर भय के सभी जगह सभी परिस्थितियों में सुसमाचार का प्रचार किया।

संत पापा ने कहा कि संत तुरिबियस न केवल भौगोलिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी अन्य किनारे तक जाना चाहते थे। उन्होने लोगों की संस्कृति और भाषा सीखी। लीमा की तीसरी धर्माध्यक्षीय परिषद में उन्होंने धर्मप्रांतीय धर्मशिक्षा की किताबों को क्यूचुआ और आयमारा भाषा में अनुवादित कर संकलित करने के लिए प्रदान किया था। उनहोंने पुरोहितों को भी स्थानीय भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया जिससे वे स्थानीय भाषा के प्रयोग करते हुए संस्कारों का अनुष्ठान कर सकें जिससे विश्वासी भी समझ सकें।

संत तुरिबियस दया के कार्यों के माध्यम से सुसमाचार का प्रचार करते था। उनके अनुसार ‘दया के बिना सुसमाचार का प्रचार नहीं किया जा सकता’। उनका कहना था कि ईश्वर के बच्चे और शैतान के बच्चें इस तरह से प्रकट होते हैं: जो लोग न्याय नहीं करते और न ही अपने भाइयों और बहनों से प्रेम करते हैं वे परमेश्वर के बच्चे नहीं हैं। (सीएफ, 1 योहन 3:10) संत तुबेरियस ने अन्याय के विरुद्ध भी आवाज उठाई। 1585 में, कहाचाम्बो में कोर्रेजिडोर के वाइसराय को भ्रष्टाचार की एक पूरी व्यवस्था के खिलाफ उसे कलीसिया से बहिष्कृत कर दिया था और इस तरह उन्होंने कई लोगों से दुशमनी मोल ली थी। इस प्रकार एक चरवाहे के नाते उन्होंने लोगों की आध्यात्मिक,नैतिक और भौतिक आवश्कताओं की पूर्ति के लिए भी कार्य किया। इस तरह, संत तुरिबियस आज पूरे समाज को याद दिलाते हैं कि दया हमेशा न्याय के साथ होनी चाहिए।

 संत तुरिबियस चाहते थे कि उनके स्थानीय लोगों से ही पुरोहितों का प्रशिक्षण हो। उन्होंने धर्मप्रांत में पहला सेमिनरी खोला। अपनी प्रेरितिक यात्रा के दौरान उन्होंने अनुभव किया कि स्थानीय कलीसिया के विकास और विस्तार के लिए स्थानीय पुरोहितों की आवश्यकता है। उस समय मिश्रित परिवार से आये सेमिनरियों के पुरोहिताभिषेक विवादास्पद मुद्दा था परंतु उन्होंने सेमिनरियों के पुरोहिताभिषेक के बचाव में कहा कि यदि किसी भी क्षेत्र में पुरोहितों को अलग होना चाहिए, तो उनकी पवित्रता के आधार पर होना चाहिए और उनके नस्लीय मूल के आधार पर। उन्होंने अपने सेमिनरियों और पुरोहितों की देखभाल में कोई कसर न छोड़ी।

संत तुरिबियस ने विभिन्न कलीसियाओं और अन्य लोगों के बीच एकता लाने हेतु अथक प्रयास किया था। "लीमा की तीसरी परिषद में संत तुरिबियस के निर्देशन और प्रोत्साहन के परिणाम स्वरुप लैटिन अमेरिका के धर्मप्रांतों में विश्वास और संगठनात्मक मानदंडों में एकता के लिए उपयोगी अंतर्दृष्टि की शुरुआत हुई। संत पापा ने कहा कि हम जानते हैं कि यह एकता और सर्वसम्मति बहुत ही तनाव और संघर्ष से उभरी थी। हमें उन संघर्षों से उपर उठकर एकता के लिए ईमानदारी से तथा अतीत को नजरअंदाज न करते आमने-सामने, आपसी वार्तालाप करनी चाहिए।

संत पापा ने कहा कि संत तुरिबियस ने अकेले नदी पार नहीं की उनके पीछे एक बड़ा समूह था। जब उन्होंने अपनी जीवन यात्रा समाप्त की तो हजारों स्थानीय लोगों ने उनकी अंतिम विदाई में गाना गाया और उसे शांति के साथ पिता ईश्वर को अर्पित किया। संत पापा ने अपने भाइयों से प्रश्न किया जब हम इस दुनिया की यात्रा समाप्त करेंगे तो क्या हमें भी इसी तरह की अंतिम विदाई मिलेगी? आइये हम प्रभु से यह कृपा मांगे।

अत में संत पापा ने अपने लिए प्रार्थना करने की मांग करते हुए अपना संदेश समाप्त किया।


(Margaret Sumita Minj)

22/01/2018 16:16