Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

कलीसिया \ भारत की कलीसिया

संसद ने इस्लामिक 'तत्काल तलाक' पर रोक लगाई

काशमीर की मुस्लिम महिलायें - REUTERS

30/12/2017 14:33

नई दिल्ली, शनिवार 30 दिसम्बर 2017 (एशियान्यूज) : शुक्रवार 29 दिसम्बर को लोकसभा में पेश तीन तलाक संबंधी मुस्लिम महिला विवाह अधिकार संरक्षण विधेयक को बहुमत से पारित कर दिया गया है. इस बिल के खिलाफ सभी संशोधन खारिज हो गए हैं. बिल में तीन तलाक को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखते हुए तीन वर्ष तक कारावास और जुर्माने का प्रावधान किया गया है। अब यह बिल राज्यसभा में पेश किया जाएगा।

कई वर्षों तक इंतजार करने के बाद, कई इस्लामी महिला समूहों और संगठनों ने कानून का स्वागत किया। वे उस नियम का विरोध करती हैं जो पत्नियों को अपने पतियों की दया पर छोड़ देता है। इस नियमानुसार पति दूर से ही बस एक लिखित संदेश को भेजकर तलाक ले सकता है।

भारतीय काथलिक धर्माध्यक्षीय सम्मेलन के महासचिव धर्माध्यक्ष थेओदोर मस्करेन्हास ने कहा, "काथलिक कलीसिया पूरी दुनिया में महिलाओं के अधिकारों का समर्थन और सम्मान करती है। जो कुछ भी उनकी गरिमा और सम्मान को हानि पहुँचाती है, उन्हें अस्वीकार कर दिया जाना चाहिए।"

धर्माध्यक्ष मस्करेन्हास के अनुसार एक धार्मिक समुदाय में परिवर्तन करने की "विधि" भी महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा,"हर समुदाय को बदलने, परिवर्तन करने और खुद को सुधारने में सक्षम होना चाहिए।" इस मामले में, कोई भी कानून बदलाव के खिलाफ नहीं है। लेकिन हमें समुदायों की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए, उनके साथ चर्चा करनी चाहिए।"

उन्होंने कहा, ″कानून को उन लोगों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए, जो संदर्भ को जानते हैं। किसी समुदाय के धार्मिक मामलों से संबंधित कानूनों पर चर्चा करते समय, व्यापक संभव सहमति पर विचार करनी चाहिए।"

भारत में, इस्लामिक "तत्काल तलाक" एक बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। अगस्त में भारत के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फैसला सुनाया, इसे "असंवैधानिक" घोषित कर दिया था, लेकिन इसके समाधान हेतु संसद के लिए छोड़ दिया।

अदालत ने 50,000 मुस्लिम महिलाओं द्वारा हस्ताक्षरित एक याचिका स्वीकार कर ली थी, जिन्होंने लंबे समय तक व्यापक भेदभाव की शिकायत की थी।

भारत दुनिया के कुछ देशों में से एक है जहां इस्लामी विवाह कानून अभी भी लागू है पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित बीस मुस्लिम बहुमत वाले देशों ने इस अभ्यास को समाप्त कर दिया है।

धर्माध्यक्ष मस्करेन्हास के अनुसार, नए कानून "समुदायों के भीतर हस्तक्षेप करने के लिए दरवाजा खोलना नहीं चाहिए यह किसी समुदाय के धार्मिक मामलों में दखल देने का पहला कदम नहीं होना चाहिए। "हम इस परिवर्तन का स्वागत करते हैं, यदि यह पहले महिलाओं को और फिर मुस्लिम धर्म में मदद पहुँचायेगी।"

भारत लगभग 170 मिलियन मुसलमानों का घर है, जहाँ ज्यादातर सुन्नी, जो मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम 1937 के तहत आते हैं, जो ब्रिटिश राज के दौरान अपनाया गया था।


(Margaret Sumita Minj)

30/12/2017 14:33