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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 90-2

याँगून में बाईबिल पढ़ती एक काथलिक महिला, तस्वीरः 26.11.2017 - AFP

26/12/2017 10:43

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें।

"हम तेरे कोप से भस्म हो गये हैं; तेरे क्रोध से आतंकित हैं। तूने हमारे दोषों को अपने सामने रखा, हमारे गुप्त पापों को अपने मुखमण्डल के प्रकाश में। तेरे क्रोध के कारण हमारे दिन मिटते हैं, हमारे वर्ष आह भरते बीतते हैं।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 90 वें भजन के 07 से लेकर 09 तक के पद। विगत सप्ताह पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने इन्हीं पदों की व्याख्या आरम्भ की थी। 90 वें भजन में मनुष्य की नश्वरता एवं क्षणभंगुरता के प्रति ध्यान आकर्षित कराया गया है। यह भी स्मरण दिलाया गया है कि प्रभु ईश्वर मनुष्यों की सब ख़ामियों के बावजूद उनके आश्रय और शरण स्थल बने रहते हैं। मनुष्यों के प्रति ईश्वर की विश्वसनीयता एवं सत्यप्रतिज्ञता कभी भी समाप्त नहीं होती। बस पाप और बुराई ही है जो मनुष्यों को प्रभु ईश्वर से दूर करती तथा उन्हें  ईश्वर के भय से आतंकित करती है।

विगत सप्ताह हमने इस तथ्य का सिंहावलोकन किया था कि  विश्व में अकेला इस्राएल ही था जिसने यह घोषित किया था कि पाप ने मनुष्यों को ईश्वर से अलग किया था, इस्राएल के अनुसार ईश्वर कहीं ऊपर विराजमान नहीं थे बल्कि वे मनुष्यों के साथ अदन की वाटिका में विद्यमान रहा करते थे और पाप करने के उपरान्त मनुष्यों ने यह सौभाग्य, इस विशिष्ट कृपा को खो दिया था। इसी विचार के अनुसार मनुष्य अब अदन की वाटिका से बाहर, पापमय होने की वजह से, ईश्वर के कोप में जीवन यापन करता था। मनुष्य इस बात के प्रति एक प्रकार से चकित और साथ ही निराश एवं हताश था कि प्रभु ईश्वर उसकी हर गुप्त बात और उसके सब पापों का ज्ञान रखते हैं। कहता है, "तूने हमारे दोषों को अपने सामने रखा, हमारे गुप्त पापों को अपने मुखमण्डल के प्रकाश में।"

और फिर, "तेरे क्रोध के कारण हमारे दिन मिटते हैं, हमारे वर्ष आह भरते बीतते हैं।" इस प्रकार श्रोताओ, 90 वें भजन में यह चेतावनी स्पष्ट है कि प्राकृतिक मृत्यु नहीं अपितु पाप ही वह नकारात्मक तत्व हैं जो हमारे जीवन को नष्ट करता तथा हमें ईश्वर के प्रेम से दूर रखता है।

स्तोत्र ग्रन्थ के 90 वें भजन के आगे के पदों में भी मनुष्य का विलाप जारी रहता है। भजन के 10 वें एवं 11 वें पदों में हम पढ़ते हैं, "हमारी आयु की अवधि सत्तर बरस है, स्वास्थ्य अच्छा है तो, अस्सी बरस। हम अपनी अधिकांश आयु कष्ट और दुःख में बिताते हैं। हमारे दिन शीघ्र ही बीतते हैं और हम चले जाते हैं। तेरे क्रोध का बल कौन जानता है? तेरे क्रोध की थाह कौन ले सकता है?"  

श्रोताओ, इन पदों में भजनकार ने मानव जीवन सम्बन्धी एक बहुत ही अहं सवाल उठाया है। वैज्ञानिक दृष्टि से सब यही मानते हैं कि मनुष्य की मृत्यु अवश्यंभावी है। सबका यही मानना है कि वृद्धावस्था के आने तक मानव शरीर शनै. शनैः जर्जर होता चला जाता और अन्ततः उसकी मृत्यु हो जाती है किन्तु जिस प्रज्ञा के लिये भजनकार प्रार्थना करता है और जिसके विषय में हम कुरिन्थियों को प्रेषित पहले पत्र के पहले अध्याय में पढ़ते हैं वह मनुष्य में यह समझ उत्पन्न करती है कि ईश्वर का कोप मनुष्य की अपनी पापमय एवं विरोधी प्रकृति का परिणाम है।

आगे भजन के अन्तिम पाँच पदों में भजनकार विवेक और समझदारी के लिये प्रार्थना करता है। वह याचना करता है कि प्रभु उसे सद्बुद्धि का वरदान प्रदान करें, कहता है, "हमें जीवन की क्षणभंगुरता सिखा, जिससे हम में सद्बुद्धि आये। प्रभु! लौट आ। हम कब तक तेरी प्रतीक्षा करें? तू अपने सेवकों पर दया कर। भोर को हमें अपना प्रेम दिखा, जिससे हम दिन भर आनन्द के गीत गायें। दण्ड के दिनों के बदले, विपत्ति के वर्षों के बदले हमको भविष्य में सुख शांति प्रदान कर। तेरे सेवक तेरे महान कार्य देखें और उनकी सन्तान तेरी महिमा का दर्शन करे। हमारे प्रभु –ईश्वर की मधुर कृपा हम पर बनी रहे। तू हमारे सब कार्यों को सफलता प्रदान कर।" 

श्रोताओ, इन पदों से स्पष्ट है कि भजनकार के विचार यूनानी, प्राचीन अथवा आधुनिक दार्शनिकों से बिल्कुल भिन्न थे। इन दार्शनिकों ने मान लिया है कि ईश्वर का अस्तित्व है ही नहीं तथा धर्म और विश्वास सब अन्धविश्वास मात्र है। एक बात यहाँ ध्यान में रखना हितकर होगा कि 90 वें भजन का रचयिता स्वतः के लिये दीर्घायु की कामना नहीं करता, वह अमर होने की भी मंशा नहीं रखता। भजन के तीसरे पद पर यदि ग़ौर करें तो ईश्वर मनुष्य से कहते हैं, "आदम की सन्तन लौट जा।" इसका अर्थ है कि मनुष्य को आमंत्रण मिला है कि वह पुनः अपने घर लौटे, पापमय जीवन का परित्याग कर ईश्वर के पास पुनः लौटे।

अब 90 वें भजन के अन्तिम पदों में भजनकार ईश्वर को सम्बोधित कर कहता है कि वह तैयार है और ईश्वर के प्रति फिर से अभिमुख होना चाहता है।  कहता है, "हम कब तक तेरी प्रतीक्षा करें? तू अपने सेवकों पर दया कर।" वह और अधिक प्रतीक्षा नहीं करना चाहता है अपितु शीघ्रातिशीघ्र प्रभु के प्रेम का अनुभव पाना चाहता है, उनकी सत्यप्रतिज्ञता से तृप्त होकर उनके आदर में आनन्द के गीत गाना चाहता है। मानों सुलेमान के सर्वश्रेष्ठ गीत के आठवें अध्याय के छठवें पद की पंक्ति को दुहराता हुआ ईश्वर से कह रहा हो, "मुझे मोहर की तरह अपने हृदय पर लगा लो, मोहर की तरह अपनी भुजा पर बाँध लो।"

श्रोताओ, 90 वें भजन का रचयिता चार चीज़ों के लिये प्रभु से प्रार्थना करता है। सर्वप्रथम, कि प्रभु हमारे हृदयों को प्रेम से भर दें, ऐसा प्रेम जो सब बुराइयों को अभिभूत कर ले। द्वितीय, प्रभु अपने सेवकों को उनकी विपत्ति के समय अपने प्रेम का अनुभव करायें, तृतीय भविष्य यानि भावी पीढ़ियों को भी सुख शांति प्रदान करें और चौथी, प्रभु ईश्वर की कृपा हम पर सदैव बनी रहे जिससे हमें हमारे सभी कार्यों में सफलता मिलती रहे।" 


(Juliet Genevive Christopher)

26/12/2017 10:43