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वाटिकन \ दस्तावेज़

नये वैवाहिक नियमों का लक्ष्य, प्रेरितिक संवेदना

प्रतीकात्मक तस्वीर - AFP

25/11/2017 15:49

वाटिकन सिटी, शनिवार, 25 नवम्बर 2017 (रेई): संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 25 नवम्बर को परमधर्मपीठ के प्रेरितिक अदालत के तत्वधान में याजकों एवं लोकधर्मियों के लिए आयोजित प्रशिक्षण कोर्स के प्रतिभागियों को सम्बोधित किया।

संत पापा ने संम्बोधन में नये वैवाहिक नियमों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "यह आवश्यक है कि हाल में प्रकाशित दो प्रेरितिक प्रबोधनों "मितिस इयूदेक्स दोमिनूस येसुस" तथा "मितिस एत मिसेरीकोरस येसुस" पर अधिक ध्यान एवं उचित व्याख्या दी जाए ताकि जो नयी कार्यपद्धति स्थापित की गयी हैं उसको कार्यान्वित किया जा सके।"  

सिनॉड की भावना

संत पापा ने कहा कि ये दो साधन सिनॉड की पृष्ट भूमि से उठे हैं तथा सिनॉड के रास्ते को प्रस्तुत करते हैं। उन्होंने बतलाया कि सिनॉड का उद्देश्य विवाह एवं ख्रीस्तीय परिवार को प्रोत्साहन देना एवं उनकी रक्षा करना है।

संत पापा ने प्रतिभागियों से आग्रह भी किया कि जो लोग मिशनरी होने एवं सिनॉड की भावना का साक्ष्य देने हेतु प्रेरित होने के लिए एकत्रित हैं जब वे अपने समुदायों में लौटेंगे, तब वे प्रेरितिक सहानुभूति पर ध्यान दें जो कि नये वैवाहिक नियम का उद्देश्य है।

उन्होंने कहा, ″सिनॉड की भावना कलीसिया में आपके कार्यों का आधार बने, खासकर, विवाह एवं परिवार के जटिल क्षेत्रों में।"

संत पापा ने कहा कि वे कलीसियाई न्याय का इंतजार करने वाले एकाकी एवं पीड़ित विश्वासियों के करीब रहने के लिए बुलाये गये हैं तथा उनके अंतःकरण की शांति को पुनः प्राप्त करने में आवश्यक मदद देने और ईश्वर की इच्छा अनुसार यूखरिस्त संस्कार में फिर से प्रवेश करने में सहयोग देने के लिए चुने गये हैं। 

धर्मप्रांतीय धर्माध्यक्षों की भूमिका 

अपने भाषण में संत पापा ने कहा कि वे हाल के उन दो प्रेरितिक प्रबोधन में निहित खास मुद्दों को स्पष्ट करना चाहते थे, विशेषकर धर्मप्रांतीय धर्माध्यक्षों की भूमिका को।

संत पापा ने कहा कि नई लघु प्रक्रिया में धर्मप्रांतीय धर्माध्यक्ष स्वाभाविक न्यायाधीश हैं। उन्होंने कहा कि लघु प्रणाली कोई विकल्प नहीं है जिसको धर्माध्यक्ष चुन सकते थे बल्कि यह एक कर्तव्य है, जो उनके अंतःकरण से आता है तथा जो उन्हें प्रेरिताई के माध्यम से प्रदान किया गया है।

संत पापा ने लघु प्रक्रिया के लिए कई मौलिक मानदंडों को रेखांकित किया जिसमें उन्होंने दया, सामीप्य तथा स्वेच्छा दान को पहले स्थान पर रखा है। उन्होंने यह भी कहा कि ये ऐसे मोती हैं जिनकी आवश्यकता ग़रीबों को है तथा कलीसिया को सब कुछ से बढ़कर उनसे प्रेम करना चाहिए। 


(Usha Tirkey)

25/11/2017 15:49