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रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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संत पापा फ्राँसिस \ आमदर्शन व धर्मशिक्षा

"विन्सेनसियन परिवार" के सदस्यों को संत पापा का संदेश

14 अक्टूबर को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व से आये "विन्सेनसियन परिवार" के साथ संत फ्राँसिस - ANSA

14/10/2017 15:31

वाटिकन सिटी, शनिवार, 14 अक्टूबर 2017 ( रेई) : संत पापा फ्राँसिस ने शनिवार 14 अक्टूबर को संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में विश्व से आये "विन्सेनसियन परिवार" के करीब ग्यारह हजार सदस्यों का अभिवादन किया। प्रागंण में उपस्थित विन्सेनसियन धर्मसमाज के सुपीरियर जेनरल और सभी सदस्यों को उनकी उपस्थिति के लिए धन्यवाद देते हुए कहा मैं संत विन्सेंट द्वारा स्थापित संस्थानों दवारा दया के कार्यों को करते हुए इन चार सौ सालों के लिए ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ और इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आपको प्रोत्साहन के तौर पर तीन सरल क्रियाओं पर प्रकाश डालना चाहता हूँ जो सामान्य रुप से ख्रीस्तीय जीवन के लिए महत्वपूर्ण है : आराधना करना, स्वागत करना और आगे बढ़ना।

आराधना करना - संत विन्सेंट ने अन्तर्निहित निमंत्रणों को आध्यात्मिक जिंदगी बनाने तथा दिल को खोलने और शुद्ध रखने हेतु प्रार्थना को समर्पित किया था। उसने प्रार्थना की आवश्यकता को महसूस किया था। संत विन्सेंट के लिए प्रार्थना करना दिनचर्या या रुटीन मात्र नहीं था पर प्रार्थना के समय वे पूरे मन से ईश्वर की उपस्थिति में रहते थे। वे ईश्वर की आराधना में अपना समय बिताते थे।

संत पापा ने कहा कि संत विन्सेंट का कहना था कि एक बार प्रभु के सामने उपस्थित रहने की खुशी और शांति का अनुभव जिसने कर लिया है उसे आराधना करना अनिवार्य हो जाता है। संत विन्सेंट किसी तरह से तनावग्रस्त व्यक्ति को प्रार्थना में समय बिताने की सलाह देते थे उनका कहना था कि वे ईश्वर की मौजूदगी का अनुभव न भी करें तौभी अपने तनावों और तकलीफों को उनके चरणों में रखें और उनके चरणों में समय बितायें।(1659 में जी. पेनेल्ले को लिखे पत्र)

संत विन्सेंट कहा करते थे कि जो प्रार्थना और आराधना में समय बिताते हैं उनके मुँह से गंदी बातें नहीं निकलती और वे दूषित विचारों से दूर रहते हैं। वे अपनी कठोरता पर काबू पाते और दूसरों के प्रति दयालुता और सहानुभूति जैसे गुणों से सुसज्जित होते हैं। वे दूसरों के प्रति खुले रहते हैं।

संत पापा ने दूसरी क्रिया ‘स्वीकार करना’ पर अपना विचार प्रकट करते हुए कहा कि स्वीकार करने का मतलब है ‘अपने आप से बाहर निकलना’। हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि मेरा जीवन सिर्फ मेरी निजी संपत्ति है।  मेरा समय, मेरा आराम, मेरे अधिकार, मेरे कार्यक्रम ये सभी अहम् से जुड़े हुए हैं। इनका परित्याग करने से ही हम दूसरों को अपने जीवन में स्वीकार कर पायेंगे। उनके साथ संबंध स्थापित कर पायेंगे।   

एक सच्चा ख्रीस्तीय वह है जो दूसरों का स्वागत करता और स्वीकार करता है जैसा कि माता कलीसिया शुरु से करती आ रही है। माता कलीसिया के पुत्र-पुत्रियाँ होने के नाते हमें भी उनका अनुकरण करनी चाहिए। आप लोग भी सब प्रकार की कटुता, उत्तेजना, क्रोद्ध, लड़ाई-झगड़ा, परनिंदा और हर तरह की बुराई अपने बीच से दूर करें।(एफे. 4.31)

तीसरी क्रिया हैः आगे बढ़ना। जो प्यार करता है वह उसके लिए कुध भी करने को और कहीं भी जाने को तैयार रहता है। संत विन्सेंट का कहना है कि हमारा मिशन पल्ली में जाने का या सिर्फ धर्मप्रांत में ही काम करने का नहीं है परंतु ईश्वर के प्रेम रुपी मशाल को जलाये रखना है और  दुनिया के अंतिम छोर तक पहुँचाना है। हमें आगे बढ़ते जाना है। (सम्मेलन मई 30, 1659)

 अंत में संत पापा ने कहा आज संत विन्सेंट आप सभी को साहस के साथ दया के कार्यों को करते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं। आप रुके नहीं वरन आगे बढ़ते चलें। उनके कार्यों को जारी रखने हेतु आप सभी को मेरी शुभकामनाएँ।

विदित हो कि आज, विन्सेन्सियन परिवार में धर्मसंघियों और लोकघर्मी संगठनों को मिलाकर 225 समुदाय है जो 5 महाद्वीपों के 80 से भी अधिक देशों में स्वास्थ्य, शिक्षा, विश्वास प्रशिक्षण, विकास और समग्र मानव विकास के कार्य कर रहे हैं। वे बेघर, शरणार्थियों और विस्थापित व्यक्तियों, अनाथ और छोड़ दिए गए बच्चों और एकल माताओं की देखभाल करते हैं।


(Margaret Sumita Minj)

14/10/2017 15:31