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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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कलीसिया \ विश्व की कलीसिया

परमधर्मपीठीय ओरियंटल इंस्टीट्यूट पूर्वी एवं पश्चिमी के बीच सेतु

रोम के मरिया मेजर गिरजाघर में परमधर्मपीठीय ऑरियंटल इंस्टीट्यूट के लिए ख्रीस्तयाग अर्पित करते संत पापा - ANSA

12/10/2017 16:25

रोम, बृहस्पतिवार, 12 अक्टूबर 2017 (रेई): संत पापा फ्राँसिस ने बृहस्पतिवार 12 अक्तूबर को परमधर्मपीठीय ओरियंटल इंस्टीट्यूट की शतवर्षीय जयन्ती के अवसर पर, रोम स्थित मरिया मेजर महागिरजाघर में समारोही ख्रीस्तयाग अर्पित किया तथा उन्हें प्रोत्साहन दिया कि वे अत्याचार के बावजूद साहस पूर्वक ख्रीस्त का साक्ष्य देते रहें। 

परमधर्मपीठीय ओरियंटल इंस्टीट्यूट की स्थापना संत पापा बेनेडिक्ट 15वें के मोतू प्रोप्रियों ‘देई प्रोविदेनतीस’ की प्रकाशना पर 1 मई 1917 में की गयी थी।  

संत पापा ने कहा कि उनके धर्मसंघ की स्थापना प्रथम विश्व युद्ध के समय हुई थी और इसके एक सौ साल बाद आज भी युद्ध की ही स्थिति है जहाँ पूर्वी कलीसियाओं के हमारे बहुत सारे भाई-बहन अत्याचार एवं विस्थापन का सामना कर रहे हैं। यह कई सवालों को मन में लाता है जैसा कि हम नबी मलाकी के ग्रंथ में पढ़ते हैं। (मलाकी 3:1-3-20)

प्रभु अपने लोगों से शिकायत करते हुए कहते हैं, ″तुम लोगों ने मेरे विषय में कठोर शब्द कहे हैं फिर भी तुम पूछते हो, हमने आपस में तेरे विरूद्ध क्या कहा है? तुम लोगों ने कहा है, ″ईश्वर की सेवा करना व्यर्थ है। उनकी आज्ञाओं का पालन करने से तथा विश्व मंडल के प्रभु के लिए टाट के कपड़े पहने से हमें क्या लाभ? हम तो घमंडियों को धन्य समझते हैं – जो बुराई करते हैं वे फलते- फूलते हैं और जो ईश्वर की परीक्षा लेत हैं उन्हें कोई हानि नहीं होती।"(पद, 13-15).

संत पापा ने कहा कि कितनी बार हम भी ऐसा ही सोचते हैं और बहुधा इसी आवाज की ओर प्रेरित होते हैं। हम दुष्ट और विवेकहीन लोगों को देखते हैं जो अपने स्वार्थ की पूर्ति करने में दूसरों तो रौंद डालते हैं और उनके लिए यह अच्छा प्रतीत होता है। वे जैसा चाहते हैं वैसा ही कर डालते हैं तथा केवल अपने जीवन में ऐश करने की ही सोचते हैं किन्तु सवाल है कि ऐसा होता क्यों है?

‘क्यों’ सवाल का उत्तर ईश वचन देता है। मलाकी आगे कहते हैं, ″तब प्रभु भक्तों ने आपस में बातें कीं। प्रभु ने ध्यान देकर उनकी बातचीत सुनी और उनके सामने प्रभु भक्तों और उनके नाम की श्रद्धा रखने वालों के विषय में एक स्मारिका लिखी गयी।″ (पद,16)

संत पापा ने कहा इस प्रकार प्रभु अपने बच्चों को नहीं भूलते वे धार्मियों की याद करते हैं क्योंकि वे दुःख सहते, शोषित होते और सवाल करते किन्तु प्रभु पर भरोसा रखना नहीं छोड़ते हैं।

कई बार माता मरिया ने अपनी जीवन यात्रा में यही सवाल किया? किन्तु अपने हृदय में उस पर चिंतन भी किया। ईश्वर की कृपा विश्वास और आशा प्रदान करती है।

संत पापा ने कहा कि जब हम प्रार्थना करते हैं- हमारे लिए विश्वास के साहस की आवश्यकता होती है, उस दृढ़ता की कि ईश्वर हमारी प्रार्थना अवश्य सुनेंगे तथा उनके द्वार पर दस्तक देने के साहस की। 

प्रभु कहते हैं जो मांगता है उसे मिल जाता है और जो खोजते एवं खटखटाता है उसके लिए खोला जाता है।

संत पापा ने सचेत करते हुए कहा कि क्या हमारी प्रार्थना सचमुच प्रभावशाली होती है क्या इसमें हमारा मन, दिल और जीवन शामिल होता है। क्या हम ईश्वर के हृदय पर दस्तक दे सकते हैं।

येसु कहते हैं, ″कौन पिता है जो अपने पुत्र को मछली मांगने पर सांप देगा और अण्डा मांगने पर बिच्छु? यदि बुरे होने पर भी पिता अपने बच्चों को अच्छी चीजें ही देता है तो स्वर्गीय पिता क्यों हमें अच्छी चीजें नहीं प्रदान करेंगे। संत पापा ने कहा कि वे मांगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों प्रदान नहीं करेंगे। उन्होंने कहा कि यह वरदान है ईश्वर की ओर से प्राप्त कृपा। पवित्र आत्मा पिता का सच्चा उपहार है। व्यक्ति कृपा पाने के लिए प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के द्वार पर दस्तक देता है और पिता उसे पवित्र आत्मा का वरदान प्रदान करते हैं।

संत पापा ने धर्मसंघ के सभी सदस्यों को सम्बोधित कर कहा कि वे प्रभु के हृदय पर दस्तक देना सीखें, वे उसे साहस के साथ करें, क्योंकि साहसपूर्ण प्रार्थना ही कलीसिया में उनकी सेवा को पोषित एवं प्रेरित कर सकती है। उन्होंने शुभकामनाएँ दी कि उनका समर्पण फल उत्पन्न करे और वे उस पेड़ की तरह बने रहें जिनके पत्ते कभी नहीं मुरझाते हैं।" (स्तोत्र, 1,3)


(Usha Tirkey)

12/10/2017 16:25