Social:

RSS:

रेडियो वाटिकन

विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

अन्य भाषाओं:

महत्त्वपूर्ण लेख \ पत्र

पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय- स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 88 (भाग-3)

केक की दूकान में बाईबिल वाक्यांशों की प्रदर्शनी, कोलोरिडो, तस्वीरः21.09.2017 - REUTERS

02/10/2017 11:44

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें। ...

"तूने मुझे गहरे गर्त में, अन्धकारमय गहराइयों में डाल दिया है। तेरे क्रोध का भार मुझे दबाता है, उसकी लहरें मुझे डुबा ले जाती हैं।" श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 88 वें भजन के सातवें एवं आठवें पदों के शब्द। पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत विगत सप्ताह हमने इसी भजन की व्याख्या प्रस्तुत की थी। इस भजन में मनुष्य शिकायत करता, विलाप करता तथा अपने मन की परेशानियों का उल्लेख करता है। तथापि, साहस जुटाकर और अपने मन को एकाग्र कर वह प्रार्थना करता है कि प्रभु उसकी सुधि लें। वह स्वीकार करता है कि वह कमज़ोर है, वह भूल करता है, उसने पाप किये हैं किन्तु ईश्वर में अपने विश्वास के कारण उसे इस बात का ज्ञान है कि उसे ईश्वर की सहायता की नितान्त आवश्यकता है।

"तूने मुझे गहरे गर्त में, अन्धकारमय गहराइयों में डाल दिया है। तेरे क्रोध का भार मुझे दबाता है, उसकी लहरें मुझे डुबा ले जाती हैं" भजन के इन शब्दों की व्याख्या में हमने आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित कराया था कि सभी धर्मों के विचारशील लोगों ने स्वतंत्रता को एक खास मूल्य निरूपित किया है जिसे पाने के लिये प्रत्येक व्यक्ति प्रयत्नशील रहा करता है। स्वतंत्रता हासिल करना ही उसके जीवन का लक्ष्य और एकमात्र उद्देश्य बन जाता है। वास्तविक स्वतंत्र पाप से, बुराई से मुक्त रहकर ही मिल सकती है जो केवल ईश्वर की कृपा और उनकी दया का परिणाम होता है। इस दिशा में 88 वाँ भजन हमारा मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है। यह भजन हमें आमंत्रित करता है कि हम सांसारिक इच्छाओं से स्वतंत्र रहकर ईश्वर में अपने इस विश्वास को अनवरत सुदृढ़ करते रहें क्योंकि प्रभु ईश्वर अवश्य ही हमारी प्रार्थना सुनेंगे, हमारी सुधि लेंगे। 

और अब आइये 88 वें भजन के आगे के पदों पर दृष्टिपात करें। इसके आठ, नौ और दस पद इस प्रकार हैं, "तेरे क्रोध का भार मुझे दबाता है, उसकी लहरें मुझे डुबा ले जाती हैं। तूने मेरे मित्रों को मुझसे दूर कर दिया और मुझे उनकी दृष्टि में घृणित बना दिया। मैं बन्दी हूँ और भाग नहीं सकता। मेरी आँखें दुःख के कारण धुँधली पड़ गयी हैं। प्रभु! मैं दिन भर तुझे पुकारता हूँ। मैं तेरे आगे हाथ पसारे रहता हूँ।"

श्रोताओ, पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल हमें सिखाता है कि जीवन की कोई भी समस्या पाप से बदतर नहीं है। कोई बीमारी या चोट पाप से अधिक बुरी नहीं है। अन्याय के कारण पहुँचा  नुकसान भी आपके जीवन को वह क्षति नहीं पहुँचा सकता जैसी क्षति पाप के कारण होती है। वित्तीय क्षति भी जीवन की त्रासदी नहीं होती, कोई भी अप्रत्याशित त्रासदी पाप से अधिक भयंकर नहीं हो सकती। जब मनुष्य बुराई में लगने के बाद पश्चाताप करता है तब ही उसके मन में वैसे भाव उठते हैं जैसे 88 वें भजन के रचयिता के मन में उठे। उसे लगने लगता है कि प्रभु उससे नाराज़ हैं और उनकी नाराज़गी सागर की प्रचण्ड लहरों के सदृश उसे डरा रही है। उसे लगता है कि उसके मित्रों ने उसका परित्याग कर दिया है और यह सब इसलिये हुआ कि प्रभु ईश्वर का कोप उसपर पड़ा। पाप के कारण उसका मन भारी है और एक कारावास की तरह प्रतीत होता है जिसमें वह बन्दी बना हुआ है और भाग नहीं सकता।

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल हमें सिखाता है कि पाप एक व्यक्तिगत समस्या है जिसका समाधान हम स्वयं अपने बल पर नहीं पा सकते। हम अपने आपका उद्धार नहीं कर सकते, अपनी क्षमताओं और योग्यताओं के बल पर पापों की क्षमा नहीं प्राप्त कर सकते। इसके लिये मन से पश्चाताप करना ज़रूरी है। सन्त पौल इस विषय में कई बार दिशा निर्देशन दे चुके हैं। तीतुस को प्रेषित पत्र के तीसरे अध्याय के पाँचवें पद में वे लिखते हैं, "उसने नवजीवन के जल और पवित्र आत्मा की संजीवन शक्ति द्वारा हमारा उद्धार किया। उसने हमारे किसी पुण्य कर्म के कारण ऐसा नहीं किया, बल्कि इसलिये कि वह दयालु है।" और फिर तिमथी को प्रेषित पत्र के पहले अध्याय के नवें पद में सन्त पौल लिखते हैं, "ईश्वर ने हमारा उद्धार किया और हमें पवित्र जीवन जीने के लिये आमंत्रित किया। उसने हमारे किसी पुण्य कर्म के कारण नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य तथा अपनी कृपा के कारण ही ऐसा किया।"   

88 वें भजन के आगे के पदों में भजनकार मृत्यु के विषय में कई सवाल करता है और एक प्रकार से ईश्वर से याचना करता है कि वे उन्हें जीवन रहते ही उनके गुणगान का मौका प्रदान करें क्योंकि मृत्यु के बाद तो सबकुछ समाप्त हो जाता है। 11 वें, 12वें और 13 वें पदों में ईश्वर को सम्बोधित कर कहता है, "क्या तू मृतकों के लिये चमत्कार दिखायेगा? क्या मृतक उठकर तेरी स्तुति करेंगे? क्या कब्र में तेरे प्रेम की चर्चा होती है? अधोलोक में तेरी सत्यप्रतिज्ञता का बखान होता है? क्या मृत्यु की छाया में लोग तेरे चमत्कार, विस्मृति के देश में तेरी न्याय प्रियता जानते हैं।" और फिर 14 वें एवं 15 वें पदों में मानों प्रभु ईश्वर को स्मरण दिलाते हुए सवाल करता है  कि वह प्रतिदिन प्रार्थना करता है फिर क्यों उसकी प्रार्थना अनसुनी रह जाती है। कहता है, "प्रभु! मैं तुझे पुकारता हूँ। प्रातःकाल मेरी प्रार्थना तेरे पास पहुँचती है। प्रभु! तू मेरा त्याग क्यों करता है? तू मुझसे अपना मुख क्यों छिपाता है?"

इन छंदों में, भजनकार अपनी वर्तमान दुर्जेय स्थिति को प्रभु ईश्वर के समक्ष रखता है। श्रोताओ, इन पदों की व्याख्या हम आगामी सप्ताह के प्रसारण में विस्तार से करेंगे। इस समय इतना ही स्मरण दिला दें कि कभी-कभी हमारी प्रार्थना भी इसी तरह की होती है। हम भी बहुत बार प्रार्थना न सुनी जाने पर हताश हो जाते हैं और असमंजस में पड़ जाते हैं कि क्यों प्रभु हमारी प्रार्थना नहीं सुन रहे हैं। ऐसे ही समय में हमें जीवन की परीक्षा कठिन और दुर्दम्य लगने लगती है किन्तु विश्वासपूर्वक इस परीक्षा को पार कर लेने के बाद जो आनन्द मिलता है वह मन को सुख और शान्ति प्रदान करता है तथा हममें साहस और आशा का संचार करता है।


(Juliet Genevive Christopher)

02/10/2017 11:44