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भारत के ईंट भट्टों में लाखों को बनाया जाता दास, रिपोर्ट

अमृतसर के ईट भट्टे में काम करते मज़दूर, 16.09.2017 - AFP

22/09/2017 13:10

नई दिल्ली, शुक्रवार, 22 सितम्बर 2017 (ऊका समाचार): नई दिल्ली में 20 सितम्बर को एक मानवाधिकार संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया कि लाखों लोगों को भारत के ईंट भट्ठा उद्योग में दासता के "भयावह" स्तरों का सामना करना पड़ रहा है। इन लोगों में ऋण के बोझ तले दबे मज़दूरों के साथ-साथ बाल मज़दूरी करने के लिये बाध्य बच्चे भी शामिल है।

भारत के सबसे पुराने मानवाधिकार संगठन, एन्टी स्लेवरी इन्टरनेशनल ने पंजाब में ईंटों के भट्ठों में काम करनेवाले मज़दूरों पर सर्वेक्षण में पाया कि मौसमी प्रवासी श्रमिकों को फँसाने के लिए भर्ती और भुगतान प्रणाली गुलामी के चक्र को आगे बढ़ा देती है जिसके तहत वर्ष प्रति वर्ष मज़दूरों को गुलामों के सदृश जीने के लिये बाध्य किया जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, ईंटों के भट्ठों में काम करनेवाले 96 प्रतिशत मज़दूरों ने ऋण ले रखा है, सभी को बहुत कम मज़दूरी दी जाती है तथा कई मज़दूरों का वेतन आठ-आठ महीनों तक रोक दिया जाता है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गर्मी के मौसम की कड़ी धूप में मज़दूरों से कम से कम 14 घण्टे दिन में कड़ी मेहनत कराई जाती है। इसके अतिरिक्त, 14 वर्ष से कम उम्र के 65 से लेकर 80 प्रतिशत बच्चे दिन में नौ घण्टे काम करते हैं। 

मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट में इस बात की ओर ध्यान आकर्षित कराया गया कि इन पद्धतियों का असंख्य लोगों पर असर पड़ता है इसलिये कि भारत में अनुमानतः एक लाख ईंट भट्टे हैं जिनमें 2 करोड़ तीस लाख श्रमिकों को रोजगार मिल सकता है। 

एन्टी स्लेवरी इन्टरनेशनल मानवाधिकार संगठन की एशियाई शाखा की प्रबन्धक सारा माऊन्ट ने कहा, "हमने भारतीय ईंट भट्टों में बंधुआ मज़दूरी एवं बाल मज़दूरी का भयावह स्तर पाया है। युवा बच्चों को स्कूल जाने के बजाय रसायनों से भरी धूल में नौ घंटे काम करना पड़ता है।"

रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया कि ईंट भट्टों के मज़दूरों को नियमित रूप से धोखा दिया जाता है, तंग हालात में उन्हें जीवन यापन के लिये बाध्य किया जाता है तथा भर्ती और भुगतान प्रणाली के वादों की दलील देकर उनका शोषण किया जाता है।

सामाजिक न्याय सम्बन्धी स्वयंसेवी संगठन के जयसिंह ने प्रणालीगत परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा, "समय आ गया है कि सरकार इस दिशा में ज़िम्मेदारी के साथ कदम उठाये तथा मज़दूरों के शोषण को बन्द करे।" उन्होंने कहा कि 21 वीं शताब्दी में इस प्रकार शोषण वास्तव में शर्मनाक बात है।


(Juliet Genevive Christopher)

22/09/2017 13:10