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धर्मांतरण को रोकने हेतु नेपाल में नया कानून

प्रतीकात्मक तस्वीर - REUTERS

12/09/2017 17:06

काठमाण्डु, मंगलवार, 12 सितम्बर 2017 (एशियान्यूज़): नेपाल की संसद ने सभी धार्मिक परिवर्तनों के साथ-साथ, धर्मप्रचार और धर्मांतरण के सभी कार्यों को दंडित करने वाला नया आपराधिक कोड को अनुमोदित किया।

यह कानून नेपाल के नागरिकों एवं विदेशियों दोनों पर लागू है तथा इसे 2018 में पारित किया जाएगा। चूँकि अधिकतर नेपाली हिन्दू धर्म मानते हैं अतः अल्पसंख्यकों का मानना है कि कानून उनके विश्वास को हतोत्साहित करने के लिए बनाया गया है, खासकर ईसाई धर्म।

एशियान्यूज ने कुछ ख्रीस्तीय धर्मगुरूओं से इसके संबंध में बातें की, जिनमें से सभी संसद के फैसले से चिंतित हैं। वे अपने सदस्यों एवं धार्मिक स्वतंत्रता के लिए डरे हुए हैं।

नेपाल के प्रेरितिक प्रतिधर्माध्यक्ष पौल सिमिक ने कहा, ″हमें उम्मीद नहीं थी कि देश अंतर्राष्ट्रीय प्रथाओं को कम करेगा क्योंकि नेपाल मानव और धार्मिक अधिकारों पर कई संधियों और सम्मेलनों का सदस्य है।″

उन्होंने कहा कि यदि कोई सद इच्छा रखनेवाला धर्म परिवर्तन हेतु पुरोहितों से निवेदन करता है, हम उसके सच्चे मतलब की जाँच करते हैं। हम धर्मांतरण के लिए कभी दबाव नहीं डालते। अब इस बात का भय है कि पुरोहितों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी जो किसी को धर्मांतरण के लिए नहीं कहते किन्तु उन लोगों की मदद करते हैं जो धार्मिक जीवन जीना चाहते हैं। यहाँ संभावना है कि पुरोहितों के विश्वास एवं कार्यों पर भी नियंत्रण किया जा सकता है। हमें भविष्य में इसके अधिक बड़े रूप को देखना पड़ सकता है। 

नए कोड में यह लिखा गया है कि किसी व्यक्ति को किसी अन्य जाति, या समुदाय की आस्था या विश्वास को कमजोर करने के उद्देश्य से धर्मांतरित करने के लिए ″फ्लाग्रेंट डिलीक्टो″ (अपराध) में पकड़े जाने पर पांच साल तक की सजा के साथ दंडित किया जा सकता है।

इसके अलावा यदि कोई, किसी समूह की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाता है तब उसे 2,000 नेपाली रूपयों के साथ दो साल की सज़ा दी जाएगी।

न्याय मंत्री अग्नि खेल ने कहा कि कानून का औचित्य साबित करने के प्रयास में यह "हिंदुओं और बौद्धों के लिए समान रूप से लागू है। इसके द्वारा केवल ईसाईयों को निशाना नहीं बनाया गया है।

नेपाल के ख्रीस्तीय संघ के अध्यक्ष सी.बी. घटराज इस बात से असहमत हैं और उनका कहना है कि ″इस कोड का उद्देश्य धार्मिक स्वतंत्रता और रूपांतरण की स्वतंत्रता को नियंत्रित करना है।"

उन्होंने कहा, "हम हर तरह से इस नियंत्रण की निंदा करते हैं। अल्पसंख्यकों को पारंपरिक हिंदू प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन भेदभाव और उत्पीड़न के कारण लोग ईसाई धर्म में रुचि रखते हैं।"

ख्रीस्तीय नेताओं ने माना है कि राजनीतिक दलों ने ख्रीस्तीय धर्म में लोगों की बढ़ती रूचि को नियंत्रित करने के लिए ही ऐसा किया है।

उन्होंने कहा, ″हम किसी को बल पूर्वक धर्म परिवर्तन की मांग नहीं करते हैं। वे हमारे साथ शामिल होना चाहते हैं और जिन्हें हम ख्रीस्तीय समुदाय में लेने से इंकार नहीं कर सकते।″  

एपी ईसाई पार्टी के अध्यक्ष और विश्वासी कलीसिया के पादरी भारत गिरि के लिए, "यह बढ़ती ईसाई आबादी के खिलाफ एक षड्यंत्र है, लेकिन हम सुसमाचार प्रचार के कार्य को नहीं रोक सकते जो हम पुरोहितों का कार्य है। ईश्वर हमारी रक्षा जरूर करेंगे।"

एक अंतर-विश्वास समूह के प्रमुख नज़रूल हुसैन ने कहा, "सरकार अपने मन अनुसार चुनाव करने एवं धर्म मानने की स्वतंत्रता पर नियंत्रण नहीं कर सकती। हम इस प्रावधान के खिलाफ खड़े होंगे।"

इसके विपरीत, प्रधान मंत्री के सलाहकार दिनेश भट्टराई के लिए, "नया प्रावधान बलात् रूपांतरणों को नियंत्रित करने या जो धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन करते हैं उनके लिए बनाया गया है। इसके द्वारा किसी एक विश्वास या आस्था को निशाना नहीं बनाया गया है।″


(Usha Tirkey)

12/09/2017 17:06