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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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संत पापा फ्राँसिस \ अंजेलुस व संदेश

हम कलीसिया के छोटे पत्थर हैं

संत पापा फ्राँसिस,देवदूत प्रार्थना - ANSA

28/08/2017 17:16

वाटिकन सिटी, सोमवार 28 जुलाई 2017 (रेई) संत पापा फ्राँसिस ने संत पेत्रुस महागिरजा घर के प्रांगण में देवदूत प्रार्थना हेतु जमा हुए हज़ारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को  संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाई और बहनो, सुप्रभात

आज का सुसमाचार हमारे लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय की चर्चा करता है जहाँ हम येसु और उनके शिष्यों के बीच के एक संबंध से रूबरू होते हैं। येसु अपने शिष्यों से यह जानना चाहते हैं कि वे उन पर कितना विश्वास करते हैं। वे जानना चाहते हैं कि शिष्य उनके बारे में क्या सोचते हैं, वे किस हद तक उन्हें जानते और पहचानते हैं। येसु पहले यह जानने चाहते हैं कि लोग उनके बारे में क्या कहते हैं। जनता येसु को एक नबी मानती है जो अपने में सही है लेकिन यह येसु के प्रेरितिक कार्य के केन्द्र-बिन्दु और उनके वास्तविक व्यक्तित्व को प्रकट नहीं करता है। अतः वे अपने शिष्यों से यह व्यक्तिगत सवाल करते हुए कहते हैं, “लेकिन, तुम क्या कहते हो कि मैं कौन हूँॽ” येसु का यह “लेकिन” शिष्यों को भीड़ से अलग करता है जहाँ हमें इस बात की अनुभूति मिलाती है कि वे अपने शिष्यों से यह जानने की कोशिश करते हैं कि वे उन्हें किस हद तक जानते और पहचानते हैं क्योंकि वे दिन-रात उनके साथ, उनके निकट रहते हैं। येसु अपने शिष्यों से एक व्यक्तिगत उत्तर की चाह रखते हैं जो कि जनता के विचारों से भिन्न है। सिमोन पेत्रुस के हृदय से एक उत्तर प्रविष्ट होता है और वह कहता है, “आप मसीह हैं, आप जीवन्त ईश्वर के पुत्र हैं।” (मती.16.16)  पेत्रुस के मुख से निकले इन शब्दों में हम एक महानता को देखते हैं जो उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति नहीं है। संत पापा ने कहा कि इन शब्दों में हम एक दृढ़ता की झलक पाते हैं। लेकिन ये शब्द स्वर्गीय पिता की ओर से प्रेरित किये गये हैं जो सर्वप्रथम बारह शिष्यों को येसु की सच्ची पहचान के बारे में व्यक्त करती है, वे मसीह हैं जीवन्त ईश्वर के पुत्र जिसे पिता ने मानव मुक्ति हेतु दुनिया में भेजा है। इस उत्तर के द्वारा येसु स्वयं इस बात को समझते हैं कि पिता ने जिस विश्वास को शिष्यों में व्यक्त किया है उसमें वह अपनी कलीसिया की नींव को स्थापित करते हुए अपने समुदाय का निर्माण कर सकते हैं। “मैं तुम से कहता हूँ कि तुम पेत्रुस अर्थात चट्टान हो और इस चट्टान पर मैं अपनी कलीसिया बनाऊँगा।”(मती. 16.18)।

संत पापा ने कहा कि आज भी येसु हमारे द्वारा अपने मजबूत कलीसिया की स्थापना करना चाहते हैं जिसमें कोई दरार न हो, जिसकी मरम्मत करने की जरूरत न हो। कलीसिया का नवीनीकरण सदैव जरूरी है जिससे वह हम सभों का निवास स्थल बन सके जैसा कि संत फ्राँसिस अस्सीसी के समय में हुआ करता था। येसु हमारे द्वारा कलीसिया को सुचारु रुप से चलना चाहते हैं। संत पापा ने कहा कि हमें चट्टानों की जरूरत नहीं है लेकिन केवल छोटे पत्थर हमारे लिए काफी हैं। कोई भी छोटा पत्थर व्यर्थ का नहीं है बल्कि देखा जाये तो सभी छोटे पत्थर अपने में कीमती हैं क्योंकि हम येसु के द्वारा संग्रहित किये जाते हैं। वे हमें अपनी करुणा की नज़रों से देखते हैं और पवित्र आत्मा के द्वारा हमें अपनी आवश्यकता अनुसार एक उचित स्थान में पदस्थापित करते हैं जो कि एक भवन को खड़ा करने के लिए सबसे अधिक उपयोगी होता है। संत पापा ने कहा कि हम में प्रत्येक छोटे पत्थर के समान हैं जिसे येसु ख्रीस्त अपने हाथों में लेकर अपनी कलीसिया के निर्माण हेतु सजाते हैं। हममें से प्रत्येक अपने में छोटा होने के बावजूद जीवित पत्थर के सामान है क्योंकि येसु जब हमें अपने हाथों में लेते तो हम अपने में सजीव हो जाते और पवित्र आत्मा में जीवन और ईश्वरीय प्रेम से सराबोर हो जाते हैं। अतः कलीसिया में हम सभों का एक स्थान है, हमारा एक प्रेरितिक कर्तव्य है जहाँ हम एक समुदाय का निर्माण करने हेतु बुलाये जाते हैं जो कि कई तरह के पत्थरों से एक भवन के रुप में निर्मित होता है जहाँ हम भ्रातृत्व और समुदायिकता का एहसास करते हैं।

आज का सुसमाचार हमें इस बात कि याद दिलाता है कि पेत्रुस के रुप में येसु अपनी कलीसिया हेतु एक दृश्यमान समुदाय का निर्माण करना चाहते हैं जो की एक बृहद पत्थर मात्र नहीं वरन एक छोटा पत्थर है जिसे येसु अपने हाथों में लेते जो समुदाय का केन्द्र बिन्दु बनता है।

आइए हम कलीसिया और प्रेरितों की रानी माता मरियम में विश्वास करें। अंतिम ब्यारी के कक्ष में माता मरियम संत पेत्रुस की बगल में थी जब पवित्र आत्मा चेलों के ऊपर उतरा और उन्हें ख्रीस्त को प्रसारित करने हेतु दुनिया में भेजा। वे इस समय हमारे साथ रहें और हमारी सहायता करें जिससे हम उस एकता और समुदायिकता को अपने में अनुभव कर सकें जिसके लिए येसु ख्रीस्त और प्रेरितों ने प्रार्थना किया और उसके लिए कार्य करते हुए अपने प्राणों की आहूति दे दी।  

इतना कहने के बाद संत पापा ने विश्वासी और तीर्थयात्रियों के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया और सभों को अपना प्रेरितिक आशीर्वाद दिया।

देवदूत प्रार्थना के उपरान्त संत पापा फ्रांसिस ने बँगला देश, नेपाल और भारत के बाढ़ प्रभावितों की याद की और इस प्रकृति आपदा से प्रभावित लोगों के लिए प्रार्थना का निवेदन किया।

उन्होंने बर्मा के रोहिंगिया मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों की विशेष याद की और उनके साथ अपनी संवेदना और सामीप्य के भाव साक्षा किये जो अपने अधिकारों की माँग हेतु प्रताड़ित किये जा रहें हैं।

इसके उपरान्त संत पापा फ्राँसिस ने रोम के विभिन्न पल्लियों और समुदायों से आये हुए तीर्थयात्रियों और विश्वासियों का अभिवादन किया विशेष रूप से कर्मेल धर्म समाज के सदस्यों, पादुआ धर्माप्रांत से आये तोम्बेले के युवाओं और लोदीभेकियो समुदाय के विश्वासियों का जिन्होंने तीर्थ यात्रियों की भांति पैदल यात्रा की। इस तरह संत पापा ने अंत में अपने लिए प्रार्थना का नम्र निवेदन करते हुए सभों को रविवारीय मंगलकामनाएँ अर्पित की।


(Dilip Sanjay Ekka)

28/08/2017 17:16