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पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय स्तोत्र ग्रन्थ भजन (86 भाग-2)

प्रतीकात्मक तस्वीर - REUTERS

29/06/2017 16:40

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं।

स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। हम स्तोत्र ग्रंथ के छियासिवें भजन की व्याख्या में संलग्न हैं छियासिवां भजन राजा दाउद के द्वारा लिखी गई विपत्ति से उबरने हेतु प्रार्थना थी। इस भजन पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि दाउद ने सिलसिलेवार इस भजन को नहीं लिखा है परंतु अपने द्वारा लिखित अन्य भजनों और अन्य धार्मिक ग्रंथों से लेकर उन्हें एक साथ परो दिया है। यह भजन विपत्ति के दौरान प्रभु से की गई विनय प्रार्थना है हम कह सकते हैं कि छयासिवां भजन दाऊद के हृदय से निकली जीवन के हताश और निराश घड़ी की उस प्रभु से प्रार्थना है जिसे वह अच्छी तरह जानता है। 17 पदों वाले इस भजन को दाऊद ने प्रभु से 15 अनुरोध को मिलाकर संकलित किया था। विगत सप्ताह हमने सतोत्र ग्रंथ के छियासिवें भजन के प्रथम भाग याने पद संख्या 1 से 7 तक की व्याख्या की थी। इन पदों में दाउद ने प्रभु से उसकी विनय सुनने और पूरा करने की गुहार लगाई है। राजा दाऊद के इस विनय प्रार्थना में हम हमारे आध्यात्मिक जीवन में उठने वाले सवालों और उनके जवाब पाते हैं। वे सवाल हैं 1. हमें क्यों प्रार्थना करनी चाहिए। विगत सप्ताह हमने इसी प्रश्न पर गौर किया था।  हमें प्रार्थना करनी चाहिए क्योंकि हमें प्रार्थना की बहुत आवश्यकता है।

अब हम अगले सवाल पर गौर करें - हमें किससे प्रार्थना करनी चाहिए ? हमें सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी दयालु, कृपावान प्रेमी ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए।

इस भजन में हम पाते हैं कि दाऊद उस ईश्वर को जानता था जिसके पास वह विनय प्रार्थना कर रहा था

ईश्वर के गुणों और उसकी सत्यप्रतिज्ञता  को जानने से हमें प्रार्थना में आशा और धीरजता मिलती है। पिता ईश्वर के पास पहुंचने के लिए, हमें पता होना चाहिए कि वे भले हैं,  वे हमें माफ करने के लिए तैयार है, और जो भी उन के पास आते प्रभु उन्हें भरपूर प्रेम देते हैं। पद संख्या 5 में हम पढ़ते हैं ″प्रभु, तू भला है, दयालु है और अपने पुकारने वालों के लिए प्रेममय।″ दाऊद ने पद संख्या 15 में भी प्रभु की प्रकृति का विवरण किया है जो इस प्रकार है ″प्रभु, तू एक दयालु और करुणामय ईश्वर है। तू सहनशील, सत्यप्रतिज्ञ और प्रेममय है।″ इस प्रार्थना में दाऊद मूल रूप से यह मानता है कि उसका ईश्वर अपने शत्रुओं के खिलाफ है

 ईश्वर महान, सच्चा और शक्तिशाली है

दाऊद कहता है ( 8-10)  ″ प्रभु, देवताओं में तेरे सदृश कोई नहीं। तेरे कार्य अतुलनीय हैं। प्रभु तुमने राष्ट्रों का निर्माण किया, वे सब आकर तेरी आराधना करेंगे और तेरे नाम की महिमा करेंगे, क्योंकि तू महान है, तू चमत्कार दिखाता है। तू ही प्रभु है।

 इस भजन में दाऊद ने बहुत बार ईश्वर के लिए ‘प्रभु’ शब्द का प्रयोग किया है। यह उस ईश्वर के प्रभुत्व और संप्रभुता को दर्शाता है जिसने राष्ट्रों को बनाया। उसने राष्ट्रों को इस लिए बनाया कि वे सभी उसके सामने आएंगे और उसकी पूजा करेंगे। वे महान हैं और वे अद्भुत कार्य करते हैं। वे ही अकेले ईश्वर हैं।

दाऊद ने "देवताओं" का जिक्र किया था अर्थात उन देवमूर्तियों और दानवों का जिसकी यहूदी पूजा किया करते थे। शैतान को इस संसार का देवता कहा जाता है। कुरिंथियों के नाम संत पौलुस के दूसरे पत्र अध्याय 4 पद संथ्या 4 में हम पढते हैं,″ इस संसार के देवता ने अविश्वासियों का मन इतना अंधा कर दिया है कि वे ईश्वर के प्रतिरुप मसीह के महिमामय सुसमाचार की ज्योति को देखते में असमर्थ है। पूरी दुनिया उसकी शक्ति में है। (1 योहन 5-19) संत योहन का पहला पत्र अध्याय 5 पद संखया 19 में हम पढ़ते हैं ″ हम जानते हैं कि हम ईश्वर के हैं, जबकि समस्त संसार दुष्ट के वश में है। दानवों का जिक्र करते हुए कुरिंथियों के नाम पहले पत्र 8,5 में संत पौलुस कहते हैं क यद्यपि स्वर्ग में और पृथ्वी पर तथाकथित देवता और प्रभु हैं फिर भी हमारे लिए तो एक ही ईश्वर है वह पिता, जिस से सबकुछ उत्पन्न होता है और जिसके पास हमें जाना है।

यह बात तो निश्चित है कि हम ईश्वर के हैं  यह हमें प्रार्थना करने के लिए महान आत्मविश्वास देता है। हालांकि अंधेरे की शक्तियां शक्तिशाली हैं, उनमें से कोई भी परमेश्वर की तुलना नहीं कर सकता है। क्योंकि ईश्वर ने सभी राष्ट्रों को बनाया और उनकी इच्छा थी कि समस्त राष्ट्र उन्हें जानें और उनकी पूजा करें। हमारा प्रभु महान और शक्तिशाली है।

हमारा ईश्वर प्रेम, दया, और करुणा में महान हैं।

पद संख्या 3 में हम पढ़ते हैं प्रभु तू ही मेरा ईश्वर है मुझपर दया कर और पद संख्या 16 में भी दाउद ने प्रभु से दुहाई की, प्रभु मेरी सुधि ले, मुझपर दया कर। दाउद ने अपने अनुभव के आधार पर कहा, प्रभु तू भला है, तू दयालु है और अपने पुकारने वालों के लिए प्रेममय।  पद संख्या 15 कहता है है ″प्रभु, तू एक दयालु और करुणामय ईश्वर है। तू सहनशील, सत्यप्रतिज्ञ और प्रेममय है। निर्गमन ग्रंथ अध्याय 34, पद संख्या 6-7 में ईश्वर ने नबी मूसा के सामने अपना नाम ‘प्रभु’ प्रकट किया। प्रभु ने उसके सामने से निकलकर कहा, ″ प्रभु, प्रभु एक करुणामय तथा कृपालु ईश्वर है। वह देर से क्रोध करता और अनुकम्पा तथा सत्यप्रतिज्ञता का धनी है। वह हजार पीढ़ियों तक अपनी कृपा बनाये रखता और बुराई, अपराध और पाप क्षमा करता है।″

पुराने व्यवस्थान में हम प्रभु की प्रकृति के बारे में पाते हैं गणना ग्रंथ अधयाय 14 के पद संख्या 18 में हम पढ़ते हैं,″प्रभु देर से क्रोद्ध करता है और अनुकम्पा का धनी है वह अपराध और विरोध क्षमा करता है।″  योना नबी ने भी प्रभु के लिए इन शब्दों का प्रयोग कियाः ″प्रभु तू करुणामय तथा दयालु ईशवर है- देर से क्रोद्ध करने वाला, अनुग्रह का धनी और दंड देने को अनिच्छुक।″ दाऊद ने इन्हीं शब्दों का प्रयोग कर प्रभु को अपनी प्रार्थना सुनने की अपील की है, (5-6) प्रभु तू भला है, तू दयालु है और अपने पुकारने वालों के लिए प्रेममय। प्रभु। मेरी प्रार्थना सुनने और मेरी दुहाई पर ध्यान देने की कृपा कर।″

चूँकि प्रभु ने स्वयं अपने आप के प्रकट किया अतः हम भरोसे के साथ अनुग्रह के सिहासन के पास जायें, जिससे हमें दया मिले और हम वह कृपा प्राप्त करें, जो हमारी आवशयकताओं में हमारी सहायता करेगी। (इब्रा. 4-4) प्रभु हमें आमंत्रित करते हैं कि हम प्रभु से समक्ष अपने पापों की गठरी निधड़क खोल दें। प्रभु हमारे पापों का लेखा जोखा नहीं लेता। वह तो प्रेम का भंडार है, करुणामय और दयालु प्रभु है। वह चाहता है कि हम शुद्ध मन और हृदय से प्रभु के प्रेम और करुणा का रसपान करें ।   


(Margaret Sumita Minj)

29/06/2017 16:40