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विश्व के साथ संवाद करती संत पापा एवं कलीसिया की आवाज़

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संत पापा फ्राँसिस \ आमदर्शन व धर्मशिक्षा

हमारे जीवन के एम्माउस में येसु हमारे साथ हैं

बुधवारीय आम दर्शन के दौरान संत पापा - ANSA

24/05/2017 13:44

वाटिकन सिटी, बुधवार, 24 मई 2017 (सेदोक) संत पापा फ्राँसिस ने बुधवारीय आमदर्शन समारोह के अवसर पर संत पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में जमा हुए हज़ारों विश्वासियों और तीर्थयात्रियों को अपनी धर्मशिक्षा माला के दौरान संबोधित करते हुए कहा,

प्रिय भाइयो एवं बहनो, सुप्रभात।

आज मैं संत लूकस रचित सुसमाचार के अनुसार एम्माउस के दो चेलों के अनुभवों पर अपना  चिंतन साक्षा करना चाहूँगा। वे दोनों व्यक्ति अपने में हताशा थे और येरुसलेम में हो रही कटु घटनाओं से अपने को दूर रखना चाहते थे। पास्का के पहले उन में कितना जोश और उत्साह भर था, उन्हें पूर्ण विश्वास था कि उनकी और लोगों की आशा और सभी आकाक्षाएं पूरी होंगी। येसु जिन पर उनहोंने अपनी आशाएं और अपने जीवन को निछावर कर दिया उनकी मृत्यु से सारी चीज़ें छिन्न-भिन्न हो गई थी।

उन दोनों शिष्यों की मानवीय आशा टूट चुकी थी। कलवारी का क्रूस उनके लिए हार की सबसे बड़ी निशानी थी जिसकी वे कल्पना भी नहीं कर सकते थे। उनके जेहन में यह सवाल उठा कि यदि येसु वास्तव ने ईश्वर के हृदय के निकट थे तो ईश्वर इस घोर हिंसा के सामने निस्सहाय रहे, वे हिंसा और बुराई को रोकने के योग्य नहीं थे।

इन सारे विचारों के साथ दोनों शिष्य येरुसलेम को छोड़कर भागते हैं। उनकी आंखों के सामने येसु पर हुई घटनाएं अब भी सजीव थीं। पास्का का त्योहार जहाँ मुक्ति के गीत गाये जाने थे उनके जीवन के लिए शोक और मातम में तब्दील हो गया था। ऐसी परिस्थिति में वे येरुसलेम को छोड़कर एकान्त गाँव एम्माउस की राह को निकल पड़े थे। यह दृश्य सुसमाचार की घटनाओं में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है क्योंकि यह कलीसिया में हम सबों के जीवन से मेल खाता है।

संत पापा ने कहा कि उन दोनों शिष्यों का येसु से मिलन आकस्मिक प्रतीत होता है जैसे कि बहुत बार हमारे जीवन में होता है।  दोनों शिष्य अपने बीच में येसु का स्वागत करते और अपने गंतव्य स्थान की ओर बढ़े चलते हैं। वे अपनी आंखों से येसु को देखते लेकिन वे उन्हें पहचान पाने में असमर्थ होते हैं। इस तरह येसु उनके लिए “आशा का उपचार” शुरू करते हैं।

येसु उनसे सवाल जवाब करते और उनकी बातों को सुनते हैं। संत पापा ने कहा कि ईश्वर हमारे जीवन में आक्रमण नहीं करते हैं। वे अपने चेलों की उदासी और निराशा का कारण जानते थे लेकिन वे उन्हें पर्याप्त अवसर प्रदान करते हैं जिससे वे अपने जीवन में दुःख की थाह ले सकें। वे येसु में अपनी आशा को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “हम तो आशा करते थे... ” (लूका.24.21) संत पापा फ्राँसिस ने कहा कि हम सभों के जीवन में कितनी उदासी है, हम अपनी असफलता से हार कर कितना उदास हो जाते हैं। हम भी एम्माउस की राह में चल रहे उन दोनों शिष्यों के समान हैं। हम कितनी बार अपने जीवन में आशा करते हैं, कितनी बार हमारे जीवन की खुशी हम से दूर चली जाती और हम अपने को हताश और निराश पाते हैं। लेकिन येसु हमारी हार में भी हमारे साथ चलते हैं और हमारे निराशा भरे क्षणों में हममें अविश्वसनीय रुप से आशा का संचार करते हैं।

येसु उनके लिए सर्वप्रथम सुसमाचार की बातों की चर्चा करते हैं। संत पापा ने कहा कि जो बाईबल में विश्वास करता है उसे अपने जीवन की कठिन परिस्थिति में भी विजय प्राप्त होती है क्योंकि हमारी आशा व्यर्थ नहीं है। हमारे ईश्वर एक टिमटिमाते ज्योति के समान हैं जो ठंड की बहती वायु में भी जगमगाते रहते हैं। वे हमारे जीवन में निरस क्षणों में भी हमारे साथ रहते हैं।

येसु ख्रीस्त उन दो शिष्यों के लिए अपने को पवित्र परमप्रसाद के रुप में प्रकट करते हैं। वे उनके लिए रोटी लेते आशीष की प्रार्थना पढ़ते और उसे तोड़ कर उन्हें देते हैं। वे हमारे जीवन के साथ भी ऐसा ही करते हैं। वे हमारे जीवन को अपनी हाथों में लेते और उसे “तोड़ते” हैं क्योंकि बिना त्याग के हमारे लिए कोई प्रेम नहीं है।

चेले येसु को रोटी तोड़ते समय शीघ्र पहचान लेते हैं। संत पापा ने कहा कि येसु कलीसिया के द्वारा हमें अपने को व्यक्त करते हैं। वे हम ख्रीस्तीय समुदाय को बतलाते हैं कि हमें अपने में कैद हो कर नहीं रहना है बल्कि अपने जीवन की विभिन्न विषम परिस्थितियों में भी आगे बढ़ते जाना है। इस तरह वे हमारे जीवन के हताशी और निराशा के क्षणों में हम से मिलते आते हैं। अपने जीवन के निराश क्षणों में येसु से हमारा मिलन हम में नई आशा का दीप प्रज्वलित करता है।

संत पापा ने कहा कि हम सभी अपने जीवन में कठिन दौर से होकर गुजरते हैं जहाँ हमें कमजोरी विचारविहीनता और थकना की अनुभूति होती है। हम अपने जीवन में क्षितिज के दर्शन नहीं होते वरन हमें केवल एक दीवार दिखलाई देता है। लेकिन हमारे जीवन की ऐसी परिस्थिति में भी येसु हमारे साथ रहते और हमारी हौसलाअफजाई करते हुए कहते हैं, “आगे बढ़ते जाओ, बढ़ते जाओ, मैं तुम्हारे साथ हूँ।” एम्माउस के मार्ग का रहस्य हमारे जीवन का अंग है जहाँ हम अपनी कटु परिस्थितियों में भी ईश्वर के द्वारा प्रेम किये जाते हैं, यहां तक की जीवन की हार में भी वे हमारे साथ हैं। यही हमारी आशा है। हम आशा में आगे बढ़ते जाये क्योंकि वे सदैव हमारे साथ चलते हैं।


(Dilip Sanjay Ekka)

24/05/2017 13:44