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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय स्तोत्र ग्रन्थ भजन 84 (भाग-3)

अपोल्लो 13 के साथ भ्रमण करनेवाली बाईबिल की प्रति, तस्वीर 18.04.2017 - AP

16/05/2017 10:18

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें। .........

"तेरे मन्दिर में रहने वाले धन्य हैं! वे निरन्तर तेरा स्तुतिगान करते हैं। धन्य हैं वे जो तुझसे बल पाकर तेरे पर्वत सियोन की तीर्थयात्रा करते हैं। वे सूखी घाटी पार करते हुए उसे निर्झर भूमि बनाते हैं – प्रथम वर्षा उसे आशीर्वाद प्रदान करती है। चलते-चलते उनका उत्साह बढ़ता है और वे सियोन में प्रभु के सामने उपस्थित होते हैं।"

श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 84 वें भजन के 05 से लेकर 08 तक के पद। विगत सप्ताह हमने इन्हीं पदों की व्याख्या से पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम समाप्त किया था। 84 वाँ भजन तीर्थयात्राओं के दौरान गाया जानेवाला गीत है। इसमें जीवन दान के लिये ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन तथा प्रभु की स्तुति निहित है। भक्त, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर की चमत्कारिक रचनाओं पर चिन्तन कर उनके आदर में, नया गीत गाते हैं। वे इस बात को याद करते हैं कि ईश्वर ने अपने शब्द मात्र से स्वर्ग और पृथ्वी दोनों की रचना की। उन्होंने सृष्टि एवं मानव दोनों की सुधि ली और अब प्रभु सृष्टि को नित्य नया करते रहते हैं। वे मनुष्य के प्रति ईश्वर के असीम प्रेम और उनकी महती दया पर चिन्तन करते तथा उसके हार्दिक धन्यवाद देते हैं।

भजन के 05 से लेकर 08 तक के पदों में भी इस्राएल के तीर्थयात्री अपने सम्पूर्ण परिवारों को साथ लिये पवित्र पर्वत सियोन की ओर अग्रसर होते हैं। वे अपने घरों एवं गाँवों को पीछे छोड़कर जैरूसालेम की पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के लिये चलते चले जा रहे हैं। उनके हृदय हर्षोल्लास से परिपूर्ण हैं। वे मन्दिर के प्राँगण तक पहुँचने के लिये आतुर हैं ताकि प्रभु ईश्वर के दर्शन पा सकें क्योंकि वहीं वे जीवन्त ईश्वर के दर्शन कर पायेंगे। इस्राएल की तपती गर्मी से निर्जीव हुई धरती को तथा ईश प्रेम के विरुद्ध खड़े होने वाले मनुष्यों के कठोर हृदयों को प्रभु ही नवजीवन प्रदान कर सकते हैं।

वस्तुतः, श्रोताओ, भजन के चौथे पद में तीर्थयात्री कहते हैं, "गौरया को बसेरा मिल जाता है, अबाबील को अपने बच्चों के लिये घोंसला", यहाँ "गौरेया" जीवन का प्रतीक है। उसके अण्डों से नया जीवन, एक नई पीढ़ी उत्पन्न होती है और जिस प्रकार वह अपने बच्चों के लिये घोंसले का इन्तज़ाम कर लेती है उसी प्रकार प्रभु ईश्वर भी अपने द्वारा सृजित मनुष्य की देख-रेख करते हैं। भजनकार ने यहाँ कहना चाहा है कि जो लोग अपने दैनिक जीवन में प्रभु में विश्वास प्रकट कर उनके मार्ग पर चलते हैं उनमें अनवरत नवजीवन का संचार होता रहता है।

आगे, 84 वें भजन के 09 से लेकर 13 तक के पदों में निहित गीत के शब्द इस प्रकार हैं, "विश्व -मण्डल के प्रभु! मेरी प्रार्थना सुन। याकूब के ईश्वर! ध्यान देने की कृपा कर। ईश्वर, हमारे रक्षक, हमारी सुधि ले, अपने अभिषिक्त पर दया दृष्टि कर। हज़ार दिनों तक कहीं रहने की अपेक्षा एक दिन तेरे प्राँगण में बिताना अच्छा है। दुष्टों के शिविरों में रहने की अपेक्षा ईश्वर के मन्दिर की सीढ़ियों पर खड़ा होना अच्छा है; क्योंकि ईश्वर हमारी रक्षा करता और हमें कृपा तथा गौरव प्रदान करता है। वह सन्मार्ग पर चलने वालों पर अपने वरदान बरसाता है। विश्वमण्डल के प्रभु! धन्य है वह, जो तुझपर भरोसा रखता है।"    

भजन के इन पदों से स्पष्ट है कि तीर्थयात्री सियोन पर्वत अर्थात् ईश्वर के मन्दिर तक पहुँच चुके थे। नवें और दसवें पदों में उनकी पहली प्रार्थना निहित है जो स्वतः के लिये अथवा  उनके परिवारों के लिये नहीं थी बल्कि उनके राजाओं एवं उनके शासकों के लिये थी। कहते हैं, "याकूब के ईश्वर! ध्यान देने की कृपा कर। ईश्वर, हमारे रक्षक, हमारी सुधि ले, अपने अभिषिक्त पर दया दृष्टि कर।" राजा लोगों का रक्षक तथा ईश्वर द्वारा अभिषिक्त व्यक्ति था क्योंकि ईश्वर ने उसे मनुष्यों के बीच अपने कार्यों को सम्पादित करना चाहा था। इसीलिये नवीन व्यवस्थान में भी सर्वप्रथम यही शब्द मिलते हैं, "येसु ख्रीस्त, दाऊद के पुत्र।"  दाऊद राजा एवं ईश्वर द्वारा अभिषिक्त व्यक्ति था।

तदोपरान्त, भजन के अन्तिम तीन पदों में तीर्थयात्री प्रभु ईश्वर में अपने विश्वास की अभिव्यक्ति करते हैं। कहते हैं कि उन्हें केवल ईश्वर पर ही भरोसा है। श्रोताओ, इन पदों में "प्राँगण", "शिविर"  और साथ ही "मन्दिर की सीढ़ियाँ", आदि शब्दावली का उपयोग कर भजनकार ने इस तथ्य को प्रकाशित करना चाहा है कि जीवन एक अनवरत जारी तीर्थयात्रा है जैसे वह प्राचीन व्यवस्थान के नबी मूसा के काल में इस्राएलियों के लिये थी और मनुष्य की इस तीर्थयात्रा में उसकी ढाल, उसके रक्षक एवं उसके शरणस्थल प्रभु ईश्वर ही बनते हैँ। 84 वें भजन के शब्दों में, " क्योंकि ईश्वर हमारी रक्षा करता और हमें कृपा तथा गौरव प्रदान करता है। वह सन्मार्ग पर चलने वालों पर अपने वरदान बरसाता है।"

इस भजन के अन्तिम पद में ईश्वर के विषय में कुछ नहीं कहा गया है अपितु यह ईश्वर के प्रति आश्चर्य और आनन्द भरी एक अभिव्यक्ति है। इस पद में स्पष्ट कर दिया गया है कि प्रभु ईश्वर में अपने विश्वास को सुदृढ़ करना आवश्यक है क्योंकि यदि हम, यदि मनुष्य, मानव प्राणी, स्त्री और पुरुष प्रभु पर भरोसा रखते हुए जीवन पथ पर आगे बढ़ें तो, निश्चित्त रूप से, हमारे हृदय सुख और आनन्द की अनुभूति प्राप्त करेंगे, "विश्वमण्डल के प्रभु! धन्य है वह, जो तुझपर भरोसा रखता है।"


(Juliet Genevive Christopher)

16/05/2017 10:18