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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचयः स्तोत्र ग्रन्थ, भजन 83 (भाग-2)

चन्द्रमा के आस-पास उड़ान भरनेवाले अपोल्लो 13 कक्ष में, बाईबिल की प्रति (तस्वीर, ए.पी.) - AP

25/04/2017 11:48

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें। .........

"ईश्वर! मौन न रह। ईश्वर! शान्त और निष्क्रिय न रह। देख! तेरे शत्रु सक्रिय हैं, तेरे बैरी सिर उठा रहे हैं। वे तेरी प्रजा के विरुद्ध षड़यन्त्र रचते और तेरे कृपापात्रों के विरुद्ध परामर्श करते हैं।" श्रोताओ, ये थे स्तोत्र ग्रन्थ के 83 वें भजन के प्रथम दो पद। विगत सप्ताह पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत हमने 83 वें भजन की व्याख्या आरम्भ की थी। 83 वाँ भजन इस्राएल के शत्रुओं के विरुद्ध रचा गया गीत है जिसमें प्रभु ईश्वर से याचना की गई है कि इस्राएल के शत्रुओं को वे विजयी न होने दें।

इस भजन के प्रथम पदों में भजनकार कहता है, "ईश्वर! मौन न रह। ईश्वर! शान्त और निष्क्रिय न रह। देख! तेरे शत्रु सक्रिय हैं, तेरे बैरी सिर उठा रहे हैं। वे तेरी प्रजा के विरुद्ध षड़यन्त्र रचते और तेरे कृपापात्रों के विरुद्ध परामर्श करते हैं।" ये शब्द नबी इसायाह के युग में जीवन यापन करनेवाले किसी दीन व्यक्ति के मुख से निकले शब्द प्रतीत होते हैं। उस युग में, जैसा कि हमने पहले भी बताया है, अस्सिरियाई लोग उत्तर में इस्राएल एवं दक्षिण में यूदा की जातियों पर निरन्तर अत्याचार कर रहे थे। लोग इतने उत्पीड़ित थे कि ईश्वर के सिवाय उन्हें कोई बचानेवाला याद नहीं आया।

जब सब कुछ ठीक चलता है तब हम भी ईश्वर की याद बिरले ही करते हैं किन्तु जब आपत्ति आ पड़ती है तब हम ईश्वर की दुहाई देने लगते हैं। उस युग के मनुष्य की हालत भी ऐसी ही थी विपत्तितयों का सामना वह कर नहीं पाया तथा ईश्वर के सन्मुख विलाप करने लगा। ईश्वर से मदद की गुहार लगाते हुए वह शिकायत भी करता है कि दुष्ट आततायी स्वयं ईश्वर के विरुद्ध सन्धि करते हैं, इसलिये प्रभु मौन न रहें बल्कि उनका विनाश करें।  

83 वें भजन के प्रथम पदों को समझने के लिये विगत सप्ताह हमने आपका ध्यान हमारे अपने युग में हुए नरसंहारों के प्रति आकर्षित कराया था जिनमें से सम्भवतः सबसे खूँखार और बर्बर था नाज़ी नरसंहार। इस स्थल पर हमने आपके समक्ष नाज़ी प्रताड़ना से भागने में सफल हुए ईशशास्त्री पौल टिलिख का भी उदाहरण रखा था जो अपने जीवन के अन्तिम वर्षों में ईश्वर के मौन और यहाँ तक कि ईश्वर की विश्वसनीयता पर गूढ़ चिन्तन करने लगे थे। वे कहा करते थे कि ईश्वर की चुप्पी के बावजूद लोग उन्हें अभी भी "मनुष्यों के ऊपर", "सदैव भला रहनेवाला" आदि वाक्यांशों में वर्णित करने की हिम्मत करते हैं और ऐसा इसलिये कि ईश्वर स्वर्ग में विराजमान रहनेवाले पिता हैं, वे पारलौकिक हैं, उनके चारों ओर रहस्य छाया हुआ है। ईश्वर की लीला को समझना हम मनुष्यों के लिये सम्भव नहीं है, केवल विश्वास की आँखों से हम उन्हें देख पाते तथा विश्वास द्वारा ही हम उनके रहस्य को स्वीकार कर पाते हैं।

श्रोताओ, 83 वें भजन के रचयिता की अपेक्षा थी कि ईश्वर स्वतः को इस्राएल के उद्धारकर्त्ता रूप में प्रकट करें क्योंकि वह भूल गया था कि प्रभु ईश्वर मनुष्य की हर सफलता-असफलता, उसके हर सुख और दुःख और यहाँ तक कि क्रूस में अनवरत विद्यमान रहते हैं। भजनकार इस भ्रम में पड़ा था कि ईश्वर को मनुष्यों के दुःख का कोई पता नही है, वह इस भ्रम में पड़ा था कि उसका ज्ञान ईश्वर से बढ़कर है। वह इस बात को भुला बैठा था कि ईश्वर की कृपा के फलस्वरूप ही इस्राएल महान नबियों की वाणी सुन पाया था हालांकि, उसपर अमल करने में इस्राएली जाति विफल हो गई।

आगे 83 वें भजन के 10 से लेकर 14 तक के पदों में भी भजनकार के शब्दों से पता चलता है कि वह एक ही चीज़ चाहता था और वह यह कि ईश्वर इस्राएल के सभी विरोधियों का विनाश कर डालें तथा उसे बचा लें। इन पदों में हम पढ़ते हैं, "उनके साथ वैसा कर, जैसा तूने मिद्यान के साथ किया था, जैसा तूने कीशेन नदी के पास सीसरा और याबीन के साथ किया था। एनदोर में उनका विनाश हुआ था, वहाँ वे भूमि की खाद बन गये थे। उनके राजकुमारों को ओरेब और ज़एब के सदृश बना दे, उनके सब सामन्तों को ज़बह और सलमुन्ना के सदृश, जो यह कहते थे, "हम ईश्वर को चरागाहों को अपने अधिकार में कर लें"। मेरे ईश्वर! उन्हें बवण्डर के पत्तों के सदृश, पवन में भूसी के सदृश बना दे।" 

इन शब्दों में भजनकार की व्यथा को अभिव्यक्ति मिली है। वह दुःखी होकर इतिहास के प्रति अभिमुख होता है तथा ईश्वर को याद दिलाता है कि उन्होंने किस-किस तरह इस्राएल की रक्षा की थी किन्तु यह भूल जाता है कि उन दिनों में इस्राएल युवा था जबकि अब आमोस, मीकाह, होज़ेया तथा इसायाह जैसे महान नबियों की वाणी सुन-सुन कर परिपक्व हो चुका था। इन नबियों ने इस्राएल को ईश्वर के मार्ग से परिचित कराया था जिनके दृष्टिकोण सैमसन और गिदियोन से कहीं अधिक श्रेष्ठकर थे। आगे के पदों में भजनकार, मानों, दुष्टों को अभिशाप देते हुए कहता है, "जिस तरह आग जंगल को भस्म कर देती है, जिस तरह ज्वाला पर्वतों को जलाती है, उसी तरह अपने तूफान से उनका पीछा कर, अपनी आँधी से उन्हें आतंकित कर। प्रभु! उनका मुख कलंकित कर, जिससे लोग तेरे नाम की शरण आयें। वे सदा के लिये लज्जित और भयभीत हों और कलंकित होकर नष्ट हो जायें। वे जान जायें कि तेरा ही नाम प्रभु है, तू ही समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च ईश्वर है।" 

श्रोताओ, इन शब्दों में हम मनुष्य की निस्सहायता और व्यर्थता को देखते हैं। उसके मन में बस एक ही ख़्याल आता है और वह यह कि उसे कष्ट देनेवाला नष्ट हो जाये। भूसी के सदृश वह आँधी के साथ उड़ जाये, आग में भस्म हो जाये आदि आदि। इसी बीच, अचानक उसके मन में यह बात आती है कि ईश्वर के कार्य देखकर लोग उनकी शरण जायें। ग़ौर करें कि इस प्रकार के ख़्याल कभी-कभी हमारे मन में भी उठते हैं। वस्तुतः, मानव स्वभाव ही ऐसा है, ईश्वर को तो वह पुकारता है किन्तु साथ ही अन्यों को अभिशाप देता है, अन्यों के लिये अपशब्द बोलता है। अपनी इस निस्सहायता में वह ईश्वर की दुहाई देता है कि प्रभु चमत्कार करें और भजनकार के सदृश कहता है, "जिससे वे जान जायें कि तेरा ही नाम प्रभु है, तू ही समस्त पृथ्वी पर सर्वोच्च ईश्वर है।"


(Juliet Genevive Christopher)

25/04/2017 11:48