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पवित्रधर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचयः स्तोत्र ग्रन्थ भजन 82 एवं 83

पसह पर्व में भाग लेते पश्चिमी तट के नबलुस नगर में तीर्थयात्री, 17.04.2017 - AFP

18/04/2017 11:55

पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत इस समय हम बाईबिल के प्राचीन व्यवस्थान के स्तोत्र ग्रन्थ की व्याख्या में संलग्न हैं। स्तोत्र ग्रन्थ 150 भजनों का संग्रह है। इन भजनों में विभिन्न ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों को प्रस्तुत किया गया है। कुछ भजन प्राचीन इस्राएलियों के इतिहास का वर्णन करते हैं तो कुछ में ईश कीर्तन, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर के प्रति धन्यवाद ज्ञापन और पापों के लिये क्षमा याचना के गीत निहित हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जिनमें प्रभु की कृपा, उनके अनुग्रह एवं अनुकम्पा की याचना की गई है। इन भजनों में मानव की दीनता एवं दयनीय दशा का स्मरण कर करुणावान ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि वे कठिनाईयों को सहन करने का साहस दें तथा सभी बाधाओं एवं अड़चनों को जीवन से दूर रखें। .........

"वे न तो जानते हैं और न ही समझते हैं, वे अन्धकार में भटकते रहते हैं। पृथ्वी के सब आधार डगमगाने लगे हैं। मैं तुम से कहता हूँ कि तुम देवता हो, सब–के-सब सर्वोच्च ईश्वर के पुत्र हो। तब भी तुम मनुष्यों की तरह मरोगे, शासकों की तरह ही तुम्हारा सर्वनाश होगा। ईश्वर! उठ और पृथ्वी का न्याय कर, क्योंकि समस्त राष्ट्र तेरे ही हैं।" ये थे 82 वें भजन के 05 से लेकर 08 तक के जिनकी व्याख्या हमने इससे पूर्व पवित्र धर्मग्रन्थ बाईबिल एक परिचय कार्यक्रम के अन्तर्गत की थी। इन पदों में भजनकार अन्यायी शासकों के विरुद्ध अपनी फटकार को जारी रखता है। वह स्मरण दिलाता है कि शासक हो अथवा प्रजा सभी का अन्त मनुष्यों की तरह होगा। मृत्यु के आगे न कोई छोटा है और न कोई बड़ा, न कोई राजा और न कोई रंक। वस्तुतः, स्तोत्र ग्रन्थ का 82 वाँ भजन निर्धन और पददलित लोगों के पक्ष में उठाई गई दैवीय आवाज़ है। धरती के किसी भी राजा या शासक ने कभी भी स्वतः को अपनी प्रजा से छोटा कभी नहीं माना, उन्होंने दुर्बल और कमज़ोर का पक्ष नहीं लिया और न ही सामाजिक न्याय की बहाली की किन्तु प्रभु ईश्वर न्यायी हैं, वे सबका न्याय करते तथा समान प्रतिष्ठा के आधार पर सभी को अपना पक्ष रखने का मौका देते हैं। ईश्वर अद्वितीय एवं एकमात्र न्यायकर्त्ता हैं। वे ही विश्व के आदि और अन्त हैं।

श्रोताओ, इस तथ्य पर हमने ग़ौर किया था कि बाईबिल सम्बन्धी विचारधारा में "इस विश्व" एवं "इस विश्व से परे" में तथा "ऊपर के देवताओं" एवं "धरती के देव सदृश राजाओं" के बीच कोई निश्चित्त रेखा नहीं खींची जा सकती और यह भी कि अनगिनत देवताओं का अस्तित्व केवल मानव मन की उपज है, ईश सत्य के साथ इसका कोई लेन-देन नहीं है। सच तो यह है कि आज भी सांसारिक शक्तियाँ विश्व पर हावी हैं। देवताओं के सदृश ही ये शक्तियाँ तथा ये विचार धाराएँ हमारे नियंत्रण के बाहर हैं। इसके विपरीत बाईबिल धर्मग्रन्थ के दोनों ही व्यवस्थान सर्वोच्च ईश्वर के अस्तित्व पर बल देते हैं जो स्वर्ग एवं पृथ्वी के सृष्टिकर्त्ता, उसके राखनहार एवं उद्धारकर्त्ता हैं।

स्तोत्र ग्रन्थ का 83 वाँ भजन इस्राएल के शत्रुओं के विरुद्ध रचा गया गीत है जिसमें प्रभु ईश्वर से याचना की गई है कि इस्राएल के शत्रुओं को वे विजयी न होने दें। इस भजन के प्रथम पाँच पद इस प्रकार हैं, "ईश्वर! मौन न रह। ईश्वर! शान्त और निष्क्रिय न रह। देख! तेरे शत्रु सक्रिय हैं, तेरे बैरी सिर उठा रहे हैं। वे तेरी प्रजा के विरुद्ध षड़यन्त्र रचते और तेरे कृपापात्रों के विरुद्ध परामर्श करते हैं। वे कहते हैं, "चलो, हम उन्हें राष्ट्र नहीं रहने दें, इस्राएल का नाम किसी को याद न रहे। वे एकमत होकर परामर्श करते हैं, वे तेरे विरुद्ध परस्पर सन्धि करते हैं – एदोम और इस्राएल के निवासी, मोआबी और हागार के वंशज, गबाली, अम्मोनी, अमालेकी, फिलिस्तिया और तिरूस के निवासी। अस्सूरी भी उनसे मिलने गये और उन्होंने लोट के पुत्रों का हाथ मज़बूत किया।"

"ईश्वर! मौन न रह। ईश्वर! शान्त और निष्क्रिय न रह।" श्रोताओ, ये शब्द किसी ऐसे दीन-हीन की भावनाओं को व्यक्त करते हैं जो इसायाह के युग में जीवन यापन कर रहा था जब अस्सिरियाई लोग उत्तर में इस्राएल एवं दक्षिण में यूदा की जातियों पर निरन्तर अत्याचार कर रहे थे। सच तो यह है कि अस्सिरियाई सेनाओं ने इन राष्ट्रों को धरती के दृश्यपटल से हटा देने की कुयोजना रची थी। उक्त शब्दों में भजन बारम्बार कहता है कि ईश्वर मौन रहे हैं, ईश्वर निष्क्रिय रहे हैं, दूसरों शब्दों में वह एक बड़ी गम्भीर बात कह रहा था। उस युग में सम्भवतः सामान्य लोगों पर उसी प्रकार अत्याचार हो रहा था जैसा कि 1940 ई. के बाद यूरोप में हुआ था जब हिटलर की सेना ने यहूदियों के सफ़ाया का बीड़ा उठाया था। आऊशविट्स एवं अन्य नज़रबन्दी शिविरों में लाखों यहूदी लोग प्रताड़ित कर मार डाले गये थे जिसे हिटलर ने "अन्तिम समाधान" का नाम दिया था।

ईशशास्त्री पौल टिलिख भी उन्हीं लोगों में से एक थे जो नाज़ी नरसंहार से भागने में सफल हो गये थे। उन्होंने अमरीका में पनाह ली थी और वहीं पर उनका निधन हो गया। वे प्रायः ईश्वर के मौन रहने और यहाँ तक कि ईश्वर की विश्वसनीयता पर गूढ़ चिन्तन करने लगे थे। वे प्रश्न किया करते थे कि क्या ईश्वर का मौन कलीसिया को उसके आरम्भिक काल के उत्पीड़न एवं शर्मिंदगी के बारे में सोचने पर बाध्य करना था? कहते हैं कि ईश्वर की चुप्पी के बावजूद लोग अभी भी "मनुष्यों के ऊपर", "सदैव भला रहनेवाला" आदि वाक्यांशों में ईश्वर को वर्णित करने की हिम्मत करते हैं। कहते हैं कि सर्वोच्च ईश्वर के साथ सुपरिचित अथवा दोस्ताना व्यवहार करने का दुस्साहस हमें नहीं करना चाहिये हालांकि वे हमारे पिता हैं, पिता तो वे हैं ही किन्तु "पिता" होने के साथ-साथ ईश्वर वे हैं जो, "स्वर्ग में है" और परिणामस्वरूप पारलौकिक हैं, रहस्य में निम्मजित, "उनके चारों ओर घने बादल एवं अन्धकार छाया हुआ है।" येसु के साथ भी ऐसा ही है। येसु "मेरे दोस्त येसु" नहीं हो सकते। प्रेरित चरित ग्रन्थ में हम पढ़ते हैं, "येसु देखते-देखते आरोहित कर लिये गये और एक बादल ने उन्हें शिष्यों की आँखों से ओझल कर दिया।"

श्रोताओ, ईशशास्त्री टिलिख के कहने का तात्पर्य यह भी हो सकता है कि ईश्वर को स्वतः को उस समय छिपा लेते हैं जब ग़लत जगह पर हम उन्हें खोजते हैं। 83 वें भजन के रचयिता की अपेक्षा थी कि ईश्वर स्वतः को इस्राएल के उद्धारकर्त्ता रूप में प्रकट करें किन्तु ऐसा ज़रूरी नहीं है क्योंकि प्रभु ईश्वर मनुष्य की हर सफलता-असफलता, उसके हर सुख और दुःख और यहाँ तक कि क्रूस में अनवरत विद्यामन रहते हैं। भजनकार लोट के पुत्रों तथा उनके साथ जा मिले देशों के इतिहास पर ध्यान आकर्षित कराता है। दुर्भाग्यवश, भजनकार इस भ्रम में पड़ा है कि वह ईश्वर से अधिक जानता है, कि उसका ज्ञान ईश्वर से बढ़कर है। वह इस भ्रम में पड़ा है कि ईश्वर केवल उसकी बपौती है। वह इस बात को भुला बैठा है कि ईश्वर की कृपा के फलस्वरूप ही इस्राएल महान नबियों की वाणी सुन पाया हालांकि, उसपर अमल करने में इस्राएली जाति विफल हो गई।


(Juliet Genevive Christopher)

18/04/2017 11:55