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असम में ‘दो बच्चे नीति’ की ख्रीस्तीयों द्वारा विरोध

असम के चाय बगानों में काम करती कुछ महिलाेँ - REUTERS

18/04/2017 16:21

नई दिल्ली, मंगलवार, 18 अप्रैल 2017 (वीआर सेदोक): भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र असम राज्य ने एक ऐसी नीति का प्रस्ताव रखा है जिसमें दम्पति दो से अधिक बच्चे पैदा नहीं कर सकते, जिसके संबंध में ख्रीस्तीय और मुस्लिम नेताओं का विचार है कि यह नीति धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने के लिए एक चाल है।

राज्य हिन्दू समर्थक भारतीय जनता पार्टी द्वारा शासित है जिसने यह घोषित किया है कि यह जनसंख्या वृद्धि की जांच हेतु एक नीति मसौदा के रूप में है। इसमें कहा गया है कि दम्पति जिन्हें दो से अधिक बच्चे हैं वे सरकारी नौकरी तथा अन्य सामाजिक कल्याण के लाभ से वंचित होंगे। मसौदा में यह भी कहा गया है कि जिनके दो से अधिक बच्चे हैं वे गांव स्तर पर चुनाव एवं नागरिक या अन्य स्वायत्त परिषद चुनाव में अयोग्य माने जायेंगे।

राज्य स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि असम में एक खतरनाक जनसंख्या विस्फोट देखा जा रहा है। 2001 की जनगणना के अनुसार कुल जनसंख्या 26.7 मिलियन थी जो 2011 की जनगणना के अनुसार बढ़कर 31.2 मिलियन हो गयी है। 

उन्होंने जनसंख्या में तीव्र वृद्धि का मुख्य कारण जल्द विवाह बताया। मंत्री ने कहा कि वे चाहते हैं कि लोग विवाह हेतु कानूनी आयु पुरुषों के लिए 21 और  महिलाओं के लिए 18 पर भी बहस करें ताकि जल्द विवाह को रोका जा सके। जो ख्रीस्तीयों एवं मुसलमानों के लिए ठीक नहीं है।

असम के गुवाहटी के महाधर्माध्यक्ष जोन मूलाकिरा ने ऊका समाचार से कहा, ″हम इस प्रस्ताव से खुश नहीं हैं क्योंकि बहुत सारे काथलिक आदिवासी समुदाय से आते हैं। सरकार की मनसा धार्मिक अल्पसंख्यकों को परेशान करना है।″

असम राज्य के बोंगाईगाँव के धर्माध्यक्ष थॉमस पुल्लोप्पिल्लील ने कहा कि यदि यह प्रस्ताव पास हो जायेगा तो यह एक अच्छा संकेत नहीं है। सभी समुदाय इसे प्रभावित होंगे।

2011 के सरकारी आंकड़े अनुसार असम में मुसलमानों एवं ख्रीस्तीयों की औसत संख्या अधिक है। राज्य के कुल 31 मिलियन में से करीब 35 प्रतिशत लोग मुसलमान हैं, लगभग चार प्रतिशत लोग ख्रीस्तीय हैं और हिन्दूओं की संख्या 61 प्रतिशत है जबकि पूरे भारत में हिन्दूओं की संख्या 80 प्रतिशत, मुस्लिमों की 18 और ख्रीस्तीयों की संख्या कुल 2.3 प्रतिशत है।

अखिल भारतीय संयुक्त डेमोक्रेटिक फ्रंट के प्रमुख बदरुद्दीन अजमल ने प्रस्तावित नीति की निंदा करते हुए कहा कि यह ″मौलिक अधिकारों का हनन है″। इस नीति के तहत मुस्लिम और ख्रीस्तीय अधिक प्रभावित होंगे क्योंकि उन परिवारों में अधिक बच्चे होते हैं।  


(Usha Tirkey)

18/04/2017 16:21