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महत्त्वपूर्ण लेख \ संतों की जीवनी

प्रेरक मोतीः सन्त मथिलदा (877-968 ई.)

सन्त मथिलदा (877-968 ई.) - RV

14/03/2017 11:14

वाटिकन सिटी, 14 मार्च सन् 2017:

मथिलदा जर्मनी के राजा हेनरी प्रथम की पत्नी थीं। एरफुर्ट के एक काथलिक मठ में उनकी नानी के अधीन उन्होंने शिक्षा दीक्षा पाई थी और इसी कारण उनमें दया, परोपकार एवं उदारता के सदगुण पोषित हो सके थे। उनकी पाँच सन्तानें थी जिनका पालन पोषण उन्होंने बड़े लाड़ प्यार से किया तथा उनमें विश्वास और पड़ोसी प्रेम के बीज बोये। सतत् प्रार्थना तथा उदारता के कार्यों के लिये उन्होंने अपने बच्चों को प्रोत्साहित किया। उनके उदाहरण से प्रभावित उनके पति राजा हेनरी प्रथम ने उन्हें पूर्ण समर्थन दिया। मथिलदा की मदद से उन्होंने दरबारियों एवं सैनिकों में भी सुसमाचार का प्रचार किया तथा सम्पूर्ण राज्य में न्याय एवं सुख शान्ति की बहाली के लिये कई अस्पताल खोले, गिरजाघरों एवं मठों का निर्माण करवाया तथा निर्धनों के कल्याण के लिये अनेक नई योजनाएँ आरम्भ कीं।

23 वर्षों तक सुखद विवाहित जीवन व्यतीत करने के बाद सन् 936 ई. में राजा हेनरी प्रथम का देहान्त हो गया। पति की मृत्यु के बाद भी मथिलदा अपनी लोकोपकारी योजनाओं को जारी रखती रहीं तथा बाद में जर्मनी के नोर्दहाऊसन में उन्होंने महिलाओं के लिये एक मठ की स्थापना कर दी।  इस मठ का मिशन था रोगियों, निर्धनों एवं क़ैदियों की सेवा करना। जीवन के अन्तिम वर्षों में ख़ुद मथिलदा भी इसी मठ में भर्ती हो गई। सतत् प्रार्थना, त्याग एवं तपस्या कर उन्होंने अपने जीवन के अन्तिम चरण को अर्थ प्रदान किया। 14 मार्च सन् 968 ई. को, 89 वर्ष की आयु में, मथिलदा का निधन हो गया। उनकी मृत्यु के तुरन्त बाद लोगों में उनकी भक्ति एक सन्त के तौर पर की जाने लगी।   

चिन्तनः सदगुणों की सच्ची चाह ही हममें सदगुण भरती है। सतत् प्रार्थना, पवित्र धर्मग्रन्थ पाठ तथा प्रभु ईश्वर पर मनन चिन्तन से अपने आन्तरिक जीवन को अनवरत पोषित किया जा सकता है।


(Juliet Genevive Christopher)

14/03/2017 11:14