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     होम पेज > आमदर्शन और देवदूत प्रार्थना >  2013-01-28 11:55:41
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वाटिकन सिटीः देवदूत प्रार्थना से पूर्व दिया गया सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें का सन्देश



वाटिकन सिटी, 28 जनवरी सन् 2013 (सेदोक): रोम स्थित सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्राँगण में, रविवार 27 जनवरी को एकत्र भक्त समुदाय के साथ, देवदूत प्रार्थना के पाठ से पूर्व, सन्त पापा बेनेडिक्ट 16 वें ने कहाः
"अति प्रिय भाइयो एवं बहनो,
आज के धर्मविधिक पाठ, हमारे समक्ष, सन्त लूकस रचित सुसमाचार के दो अलग अलग पाठों की प्रस्तावना करते हैं। पहला पाठ (1,1-4) एक आमुख है जो "थियोफिलो" नामक व्यक्ति को सम्बोधित है; चूँकि ग्रीक भाषा में इस नाम का अर्थ होता है "ईश्वर का मित्र" हम इस व्यक्ति में उस हर विश्वासी को देख सकते हैं जो ईश्वर के प्रति उदार रहता है तथा सुसमाचार को जानना चाहता है। जबकि, दूसरा पाठ (4, 14-21), हमारे समक्ष येसु को प्रस्तुत करता है जो "पवित्रआत्मा के सामर्थ्य से" विश्राम दिवस के दिन नाज़रेथ के यहूदी मन्दिर में जाते हैं। एक अच्छे पर्यवेक्षक रूप में, प्रभु साप्ताहिक धार्मिक रीति से पीछे नहीं हटते तथा अपने हम उम्र वालों के साथ प्रार्थना एवं पवित्र धर्मग्रन्थ पाठों के श्रवण में शामिल होते हैं। यहूदी मन्दिर की इस धार्मिक रीति के अन्तर्गत तोराह अथवा नबियों के ग्रन्थ से एक पाठ पढ़ा जाता है जिसके बाद उसकी व्याख्या की जाती है।"
सन्त पापा ने कहाः "उस दिन प्रभु पढ़ने के लिये उठे तथा नबी इसायाह के एक पाठ को उन्होंने पाया जो इस प्रकार हैः "प्रभु का आत्मा मुझपर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है। उसने मुझे भेजा है कि मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ" (इसायाह 61: 1-2)। ऑरिजिन टीका करते हैः "यह कोई संयोग की बात नहीं है कि उन्होंने खर्रा खोला तथा उस पाठ को पाया जिसमें ख़ुद उनके बारे में चर्चा थी किन्तु यह पूर्वप्रबन्धित ईश्वर का भी कार्य था (लूकस रचिस सुसमाचार पर प्रवचन, 32,3)। सच तो यह है कि पाठ समाप्त हो जाने के बाद येसु ध्यान मग्न मौन को चीरते हुए बोलते हैं: "आज धर्मग्रन्थ का यह कथन तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है" (लूकस 4:21)।

सन्त पापा ने आगे कहाः "एलेक्ज़ेनड्रिया के सन्त सिरिल इस बात की पुष्टि करते हैं कि ''धर्मग्रन्थ का यह कथन आज तुम लोगों के सामने पूरा हो गया है'', वाक्य का "आज" शब्द, ख्रीस्त के प्रथम एवं अन्तिम आगमन के बीच की स्थिति है जो विश्वासी के सुनने एवं पश्चाताप करने की क्षमता से जुड़ी है (दे. पीजी 69, 1241)। हालांकि, एक और क्रान्तिकारी अर्थ में, येसु ख़ुद इतिहास में मुक्ति के "आज" हैं, क्योंकि वे मुक्ति की परिपूर्णता का सम्पादन करते हैं। सन्त लूकस को अत्यधिक प्रिय "आज" शब्द (दे. लूकस 19, 9; 23 43), सुसमाचार लेखक को प्रिय, ख्रीस्तशास्त्रीय शीर्षक तक ले जाता है जो है, "सोतेर अर्थात् "मुक्तिदाता"। येसु के शैशवकाल के विवरण में ही यह चरवाहों से कहे स्वर्गदूत के शब्दों में भी मौजूद हैः "आज दाऊद के नगर में आपके मुक्तिदाता, प्रभु मसीह का जन्म हुआ है" (लूकस 2: 11)।
सन्त पापा ने कहाः "प्रिय मित्रो, सुसमाचार की यह शब्द "आज" हमें भी चुनौती देता है। सबसे पहले तो यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम किस तरह रविवार के दिन को व्यतीत करते हैः यह विश्राम करने एवं परिवार के साथ व्यतीत करनेवाला दिन है तथापि, इससे भी पहले यह वह दिन है जिसे प्रभु को समर्पित रखा जाना चाहिये, यूखारिस्त में भाग लेकर जिसमें हम प्रभु के रक्त एवं शरीर तथा उनके शब्द से पोषित होते हैं। दूसरा, यह दिन, हमारे तितर-बितर एवं विचलित युग में, हमें आमंत्रित करता है कि हम सुनने की अपनी क्षमता की जाँच करें। ईश्वर के बारे में बात कर सकने तथा ईश्वर के साथ बात करने से पहले उन्हें सुनना ज़रूरी है, और इसके लिये कलीसिया की धर्मविधि "पाठशाला" है ताकि हम उन प्रभु को सुन सकें जो हमसे बोलते हैं। अन्त में यह हमें बताता है कि प्रत्येक क्षण "आज" में रूपन्तरित हो सकता है, प्रत्येक क्षण हमारे मनपरिवर्तन का सुअवसर हो सकता है। हर दिन मुक्तिदायी दिन बन सकता है, क्योंकि मुक्ति वह इतिहास है जो कलीसिया के लिये तथा प्रभु येसु मसीह के हर शिष्य के लिये अनवरत जारी रहता है। यही है "कारपे दियेम" यानि आज के दिन का ख्रीस्तीय अर्थ उस आज का आप स्वागत करें जिसमें प्रभु ईश्वर आपको मुक्ति देने हेतु बुला रहे हैं।"
अन्त में सन्त पापा ने कहाः "कुँवारी मरियम सदैव हमारी आदर्श एवं हमारी मार्गदर्शक रहें ताकि हम अपने जीवन के हर दिन, हमारे और समस्त मानवजाति के मुक्तिदाता, ईश्वर की उपस्थिति को पहचान सकें तथा उसका स्वागत कर सकें।"
इतना कहकर सन्त पापा ने उपस्थित भक्त समुदाय के साथ देवदूत प्रार्थना का पाठ किया तथा सबके प्रति मंगलकामनाएं अर्पित करते हुए सबको अपना प्रेरितिक आशीर्वाद प्रदान किया।
श्रोताओ, रविवार 27 जनवरी को सम्पूर्ण यूरोप में, नाज़ी यहूदी नरसंहार का स्मृति दिवस मनाया गया, विश्व कुष्ठ रोगी दिवस मनाया गया तथा पवित्र भूमि में शांति हेतु प्रार्थना दिवस मनाया गया। इन सभी विशिष्ठ अवसरों का सन्त पापा ने देवदूत प्रार्थना के बाद स्मरण किया। यहूदी नरसंहार की याद में उन्होंने कहा, "आज, नाज़ीवाद के शिकार लोगों के नरसंहार की याद में स्मृति दिवस मनाया जा रहा है। विशेष रूप से, यहूदियों पर क्रूर प्रहार करनेवाली इस महान त्रासदी की याद सबके लिये एक चेतावनी होनी चाहिये ताकि अतीत की इस बीभत्सता को फिर कभी दुहराया नहीं जाये। हर प्रकार की घृणा एवं नस्लवाद पर विजय पाई जाये तथा मानव व्यक्ति की प्रतिष्ठा एवं उसकी मान मर्यादा का सम्मान किया जाये।"
कुष्ठ रोगी दिवस के उपलक्ष्य में उन्होंने कहा, "आज साठवाँ कुष्ठ रोगी दिवस मनाया जा रहा है। उन सब लोगों के प्रति मैँ अपने सामीप्य का प्रदर्शन करता हूँ जो इस बीमारी से ग्रस्त हैं तथा खोजकर्त्ताओं, स्वास्थ्य कार्यकर्त्ताओं एवं स्वयंसेवकों और विशेष रूप से, राऊल फोलेरो के मित्र एवं काथलिक संगठनों को प्रोत्साहन देता हूँ। इन सबके लिये मैं, कुष्ठ रोगियों के लिये अपना जीवन अर्पित करनेवाले, सन्त डेमियन एवं सन्त मेरियन कोपे के आध्यात्मिक समर्थन की याचना करता हूँ।"
पवित्र भूमि में शांति हेतु प्रार्थना दिवस के उपलक्ष्य में सन्त पापा ने उन सबको धन्यवाद ज्ञापित किया जो विभिन्न पहलों द्वारा उस क्षेत्र में शांति को प्रोत्साहन प्रदान कर रहे हैं। अन्त में सन्त पापा ने सबके प्रति शुभ रविवार की मंगलकामनाएँ व्यक्त की।

Juliet Genevive Christopher


कांदिविदी






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